स्वच्छता सर्वेक्षण में टॉप, लेकिन है गन्दगी का बॉस

अपनी अयोग्यता पर ‘मुहर’ लगाते योगी आदित्यनाथ

—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

जनसंख्या की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य, बेरोज़गारी की दृष्टि से देश का सर्वाधिक अनियोजित राज्य, आपराधिक कृत्यों के विचार से सर्वाधिक चिन्तनीय राज्य, ग़रीबी और भुखमरी की दृष्टि से सर्वाधिक बद्हाल राज्य उत्तरप्रदेश है। इस राज्य की समृद्धि और सम्पन्नता का दोहन करके यहाँ कभी ‘सड़कछाप’ गुण्डे-मवाली रहे आज बाहुबली और दबंग माने-जाने जा रहे हैं। बाहुबली बनने का साधारण-सा फार्मूला होता है— पहले चोरी-छिनारी करो; किसी की साइकिल चोरी कर लो; जेल जाओ और वहाँ कै़द अपराधियों के साथ मेलजोल बढ़ाकर उनके ख़तरनाक बनने की कहानी को सुन-समझकर अपने आचरण में ढालते जाओ। जेल से छूटने पर किसी बड़े व्यवसायी का ख़ून कर दो; थानेवालों को खिला-पिलाकर और उनकी जेब में नोट भरकर उनके क़रीब आते जाओ। जिसकी सत्ता हो, उसके दो-चार विधायकों-सांसदों को अपने हरामी क़िस्म के गुण्डा होने का एहसास कराओ। आठ-दस की जगह-ज़मीन पर हाथ मारो। देखते-ही-देखते, एक दहशत-पसन्द गुण्डा-दादा की शक़्ल उभरने लगती है। पता चलता है कि चार-छ: महीने में एक इलाक़ाई बाहुबली जन्म ले चुका है। उत्तरप्रदेश में ऐसे ही बाहुबली बनते आ रहे हैं।

पिछले एक साल से उत्तरप्रदेश में खुलेआम की और करवायी जा रही गुण्डई की दहशत से आज हर व्यक्ति अपना जीवन संकट में देख रहा है। इसका मुख्य कारण है कि जिन तन्त्रों के हाथों में आम लोग की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है, वे आपराधिक तत्त्वों के साथ साँठ-गाँठ किये हुए हैं। एक तरह से कहें तो वे उन गुण्डों के दिये हुए रुपयों और सुविधा-साधन पर पल रहे हैं और जिस कर्म को करने के लिए उन्हें नौकरी दी गयी है, उसे ठेंगे पर मारते आ रहे हैं। इन सभी आरोपों की पुष्टि गत एक-दो माह के भीतर “डंके की चोट पर” किये गये अपहरण; ज़मीन-क़ब्ज़ा; सामूहिक बलात्कार; सामूहिक हत्या; आदिक घिनौने कृत्यों से हो चुकी है। यही कारण है कि देश के इतिहास में जितनी बड़ी संख्या में उत्तरप्रदेश के पुलिसकर्मी निलम्बित और स्थानान्तरित किये गये हैं, उतने अन्य किसी भी राज्य में नहीं किये गये हैं। कानपुर की पुलिस की जो भी इज़्ज़त बची थी, उस पर भी ‘ब्राण्डेड’ कालिख़ पुत चुकी है। जिस तरह से कानपुर विश्वविद्यालय से डिग्री पाया हुआ विद्यार्थी सन्दिग्ध दिखता है, उससे कहीं बढ़कर कानपुर की पुलिस अविश्वसनीय दिख रही है। अपराध की दृष्टि से ग़ाज़ियाबाद बहुत पहले से ही जाना-माना जाता रहा है। इसके बाद भी उत्तरप्रदेश का शासन तन्द्रा में पड़ा रहा। जुलाई में तीन दिनों के भीतर अपहरण, लूट, हत्या की चार दुर्दान्त घटनाएँ घटित हो जाती हैं और वहाँ का पुलिस-प्रशासन सोता रहता है?..! उन घटनाओं में पुलिस की ही भूमिका नकारात्मक दिखती है, जिससे वहाँ की पुलिस की अपराधियों के साथ मिलीभगत के आरोपों से इन्कार नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ का खुफ़िया विभाग कानों में तेल डाले पड़ा रहता है या फिर वह उत्तरप्रदेश के मुखिया को बताता है; परन्तु मुखिया अपनी प्राथमिकता में उसे नहीं पाता है। उक्त प्रकार की घटनाएँ तो यही चिल्ला-चिल्लाकर कहती हैं। मुख्यमन्त्री भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ दिखता है। राज्य की जनता से योगी आदित्यनाथ ने वादा किया था और इस आशय का भरोसा भी कराया था– अखिलेश-यादव की सरकार में जिस तरह से अपराध बढ़ रहे हैं, उन्हें मैं समाप्त कर ‘रामराज’ लाऊँगा।

अपने इस भरोसे पर आदित्यनाथ दो सौ प्रतिशत नाकामयाब मुख्यमन्त्री साबित हो चुके हैं। यही कारण है कि उस मुख्यमन्त्री के पास मात्र एक उपाय रह जाता है; और वह यह कि सम्बन्धित थानों के कुछ अधिकारियों का स्थानान्तरण कर जाँच बैठाकर आक्रोशित जनसमुदाय को शान्त कर दो, जबकि उसका यह उपाय अपराध को बढ़ावा देनेवाला होता है। ऐसा इसलिए कि जो भ्रष्ट और आचरणहीन पुलिसकर्मी होता है, वह जानता रहता है कि उसका कोई क्या कर लेगा; अधिक-से-अधिक स्थानान्तरण करा देगा, जिसके लिए तो वह तैयार रहता ही है। ऐसे कर्महीन पुलिसकर्मियों के विरुद्ध ‘त्वरित न्यायालय’ में कार्यवाही कराकर जेल के भीतर ठूँसवा देना चाहिए।

विकास दुबे-प्रकरण में वहाँ के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और वर्तमान में पी०ए०सी० डी०आइ०जी० अनन्तदेव तिवारी का नाम लगातार उछलता आ रहा है; किन्तु मुख्यमन्त्री में इतना भी साहस नहीं कि वह उस अधिकारी को निलम्बित कर उसके विरुद्ध समुचित कार्रवाई का आदेश कर सके। यही कारण है कि अब उत्तरप्रदेश की पुलिस अकर्मण्य दिख रही है और कानपुर में विकास दुबे-हत्याकाण्ड के बाद से अनेक जघन्य कृत्यों को अंजाम दिया जा चुका है, जिनमें कानपुर के पुलिसकर्मी संलिप्त बताये जा रहे हैं। इसका सबसे बड़े प्रमाण हैं, कानपुर के बर्रा थाना के अन्तर्गत संजीत का अपहरण, उसकी हत्या तथा फ़िरौती की रक़्मउगाही। कानपुर-पुलिस की निष्क्रियता के चलते ही इस पूरे प्रकरण को अब ‘सी०बी०आइ०’ को सौंपा गया है। अमेठी की मुस्लिम माँ-बेटी स्थानीय पुलिस-अधिकारियों के चौखट पर न्याय के लिए गिड़गिड़ाती रहीं; किन्तु पुलिस नपुंसक बनी रही, फिर वे मुख्यमन्त्री से गुहार लगाती रहीं कि दबंगों ने उनका जीना दूभर कर दिया है; किन्तु मुख्यमन्त्री उनके साथ न्याय नहीं कर सके। अन्तत:, मुख्यमन्त्री-कार्यालय के सामने माँ-बेटी ने आग लगा ली, परिणामस्वरूप अस्सी प्रतिशत जली माँ ने दूसरे दिन दम तोड़ दिया था, तब कहीं जाकर उत्तरप्रदेश-शासन जागा ओर पुलिस-अधिकारियों को निलम्बित किया। यही यदि ज़िला-प्रशासन-स्तर पर उनका प्रकरण सुलझा लिया जाता तो उक्त प्रकार की अमानवीय घटना तो नहीं होती। यहाँ भी योगी आदित्यनाथ उत्तरदायी हैं और अपनी अयोग्यता पर स्वयं मुहर लगाते हैं।

जनसामान्य को यह तो सुस्पष्ट हो गया है कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री आदित्यनाथ योगी शासन करने में पूरी तरह से असफल हो चुके हैं। वे जातिवाद को बढ़ावा देते आ रहे हैं। उत्तरप्रदेश में पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य आदिक क्षेत्रों में जो भी शीर्ष पद हैं, उनमें अधिकतर ‘सिंह’ उपनामवाले कुण्डली मार कर बैठ गये हैं। इससे पहले उत्तरप्रदेश में ‘यादववाद’ और ‘दलितवाद’ का बोलबाला रहा था और अब, पूरी तरह से ‘ठाकुरवाद’ का वर्चस्व सिर चढ़कर बोल रहा है।

यह कैसा तर्क है कि कोई मुख्यमन्त्री ‘ब्राह्मण’-जाति का हो तो वह प्रभावकारी क्षेत्रों में ‘ब्राह्मणवाद’; ‘क्षत्रिय’-जाति का हो तो ‘ठाकुरवाद’, ‘वैश्य’-जाति का हो तो ‘कायस्थवाद-बनियावाद’ तथा कोई ‘शूद्र’-जाति का हो तो ‘दलितवाद’ का परचम लहराये। ऐसे मुख्यमन्त्रियों के विरुद्ध तो ‘समाजद्रोह’ का वाद (मुक़द्दमा) चलाया जाना चाहिए।

यही कारण है कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ “डंकेेे की चोट पर” ‘ठाकुरवाद’ को प्रश्रय देते आ रहे हैं। उदाहरण के लिए, कुलदीप ‘सिंह’ सेंगर के जघन्य कृत्य के बाद भी उसे उत्तरप्रदेश-शासन का समर्थन मिलता रहा। यदि ऐसा नहीं था तो सेंगर को उसी समय ‘भारतीय जनता पार्टी’ से बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाया गया था, जब उसे जेल लाया जा रहा था? उच्चतम न्यायालय ने अपना न्यायप्रिय कठोर रूप दिखाया तब जाकर उत्तरप्रदेश की सरकार को जागना पड़ा था। यदि नहीं, तो क्या कारण है, बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर को हटाने में ७७९ दिन लग गये थे ? यही कारण है कि उत्तरप्रदेश का पुलिस-तन्त्र उत्तरप्रदेश के बाहुबलियों की ‘कठपुतली’ बनकर रह गया है। ऐसा नहीं है कि उत्तरप्रदेश में कर्त्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी नहीं है; परन्तु उन्हें अपनी कर्त्तव्यपरायणता का परिचय नहीं देने दिया जाता। निस्सन्देह, यह शोचनीय विषय है।

उत्तरप्रदेश के सरकारी साहित्यिक संस्थानों में भी खुलकर ‘ठाकुरवाद’ का परिदृ्श्य सामने है। प्रयागराज में स्थित ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ में जितने भी पदाधिकारी हैं– अध्यक्ष से लेकर सचिव तक– सभी ‘ठाकुर’ हैं। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ का अध्यक्ष भी ठाकुर है; उत्तरप्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय का कुलपति भी ठाकुर है। कुछ माह-पूर्व नियुक्त किये गये उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग के तीन सदस्यों में से दो सदस्य ठाकुर हैं। यह बानगीभर भर है। जिन-जिन विभागों में जितने भी शीर्ष के पद हैं, अधिकतर में ठाकुरों को भरा गया है। ऐसा इसलिए कि जो साहिब योगी आदित्यनाथ के नाम से जाने जाते हैं, वे दरअस्ल उत्तराखण्ड के ‘ठाकुर’ हैं। आदित्यनाथ ‘विष्ट’ हैं, जो कि क्षत्रियों की एक प्रजाति है। ये सभी आरोप अकारण नहीं हैं।

प्रश्न है, यह जातिवादी रोग कैसे नष्ट होगा?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ अगस्त, २०२० ईसवी)

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