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हिन्दू, हिन्दुस्तान, भारत व उसकी भारतीयता एवं राष्ट्रवाद को सैद्धांतिक रूप से परिभाषित करता यह आर्टिकल अवश्य पढ़िए…

हिन्दू, हिन्दुस्तान, व राष्ट्रवाद की सैद्धांतिक परिभाषा


यदि आपको हिंदू हिंदुस्तान हिन्दूधर्म से वास्तव में इतना अधिक प्रेम है तो प्रत्येक हिंदुस्तानी के लिए आप 25 वर्षीय निःशुल्क, अनिवार्य, अबाध्य विद्यार्थीजीवन का ब्रह्मचर्य आश्रम और उसके बाद कृषिभूमि, वाणिज्यिकपूंजी, राजकीयवेतन, नेतृत्वभत्ता में से प्रत्येक वयस्क हिंदुस्तानी नागरिक के लिए उसकी निजी पात्रतानुसार “एक रोजगार” की सुलभता हेतु गृहस्थ आश्रम लागू क्यों नहीं करवाना चाहते और राजकोष द्वारा ये दोनों सेवाएं निःशुल्क क्यों नहीं सुलभ करवाते.? क्यों तड़पाते हो जनता को..? वास्तव में पूर्णशिक्षा-प्रशिक्षण और रोजगार की सुनिश्चित सुलभता ही सनातन आश्रमधर्म है ब्रह्मचर्य और गृहस्थ भी।

यही मूल भारतीय धर्म है अनादि काल से प्रशस्त वैदिक व्यवस्था। तो आप लोग बाकी बातें करके जनता को दिग्भ्रमित क्यों करते हो..? प्रत्येक हिंदुस्तानी के लिए शिक्षा और रोजगार निःशुल्क, अनिवार्य, अबाध क्यों नहीं बनाते..? इस न्यायशीलता को त्यागकर कोई भी हिंदुत्व अथवा भारतीयता अथवा राष्ट्रवाद की बात व्यर्थ है।

अपने वर्णाश्रमधर्म (4Q’s – PQ, IQ, EQ, SQ आधारित पात्रतानुसार पदनियुक्ति) को त्यागने वाला कभी हिन्दू, हिंदुस्तानी या भारतीय नहीं हो सकता। जो अपनी जनता को न्यायपूर्वक समान और उचित रूप से न शिक्षा दे सके, न रोजगार, उसे धर्म कहने का कोई औचित्य शेष नहीं रह जाता। सामान्य प्रजा के विरुद्ध कूटनीतिक छल प्रपंच कभी सत्यात्मक धर्म नहीं हो सकता। “न्यायमूलं सुराज्यं स्यात्” ही वैदिक उद्घोष है। यदि हिन्दू समाज अपने लोगों को न्यायपूर्वक शिक्षा और रोजगार समुचित रूप से सुलभ कराए रखता, उन्हें अशिक्षित और गरीब न बनाता तो कोई हिंदू भागकर मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध पारसी बहाई न बनता।

अभी भी वक्त है न्यायप्रिय बनो, अपने ही लोगों को सताना बन्द करो, हिंदुस्तान और हिंदूधर्म बर्बाद होने से बच जाएगा।
वरना समय बीत पुनि का पछताने..!

✍ राम गुप्ता
(स्वतंत्र पत्रकार – साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक)
आम आदमी पार्टी, उत्तरप्रदेश