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उत्तरप्रदेश-शासन का परिव्यय (बजट) महज़ छलावा!

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

शिक्षित बेरोज़गारों, बढ़ती महँगाई तथा पेट्रोल-डीज़ल-रसोईगैस के प्रतिदिन बढ़ाये जा रहे दामों के प्रति उत्तरप्रदेश-शासन असंवेदनशील दिख रहा है, अन्यथा ‘वैट’ में कमी कर सकता था।

किसी भी प्रकार की विकास योजना तब अच्छी लगती है जब जनजन का पेट भरा रहे। अपनी गर्हित रीति और नीति के चलते, इस शासन ने उत्तरप्रदेश के निवासियों की सम्पूर्ण जीवनशैली को असंतुलित कर रखा है।

अपने इस परिव्यय में शिक्षा को स्पष्टत: रोज़गार से जोड़ने के लिए शासन का परिव्यय ‘नंगा’ दिखता है। भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी, दलाली तथा आपराधिक कृत्यों पर नियन्त्रण करने के लिए उत्तरप्रदेश-राज्य का परिव्यय ‘मौन’ दिख रहा है। किसानों के लिए लागू की गयी पहले की परियोजनाओं के अन्तर्गत उन्हें अभी तक लाभ नहीं मिला है, जबकि उचित समय पर किसानों की देय राशि के विषय में परिव्यय की थैली सिकुड़ी दिख रही है।

जनसामान्य के लिए उत्तरप्रदेश के इस परिव्यय में ऐसा कुछ नहीं है, जो उसे उससे सीधे जोड़ पा रही हो। शासन ने अपने इस परिव्यय में जो भी सब़्ज़बाग़ दिखाये हैं, उनसे सीधे शासन को ही लाभ मिलता दिख रहा है, जो विभिन्न करों और अन्य आय के माध्यम से उसकी ‘भूखी’ झोली को भरने के काम करेंगे।

आम जनता को ससम्मान दो वक़्त की रोटी-दाल चाहिए, जो मिल नहीं पा रही है। इस शासन के समय में जो भी शासकीय सेवाओं में नियुक्तियाँ पा रहा है, उसे रातदिन भय सता रहा है कि कहीं शासन उन्हें ‘संविदा-आधारित सेवा’ न घोषित कर दे तथा निष्ठापूर्वक कर्त्तव्य कर रहे कर्मचारियों को ‘अपराधी’ घोषित करा दे।

इस शासन ने परिव्यय में छात्र-छात्राओं के लिए ‘टैबलेट’ देने की व्यवस्था की है। अब प्रश्न है, ‘टैबलेट’ हवा से तो चलाया नहीं जायेगा; उसके लिए ‘सिम’ और ‘रीचार्ज’ कराते रहने की छात्र-छात्राओं को स्वयं व्यवस्था करनी पड़ेगी, जिनके विक्रय पर शासन को तरह-तरह के करों के नाम पर उसकी थैली में सीधे रुपये जायेंगे। शासन को छात्र-छात्राओं के स्वास्थ्य, शैक्षिक शुल्क, अध्ययनसामग्री तथा उनकी परीक्षाओं की तैयारी के विषय में गम्भीर दिखते हुए ‘आर्थिक बोझ’ को हटाना चाहिए था, जबकि शासन यहाँ ‘कृपण’ और ‘निर्दय’ दिखता है।

बेशक, उत्तरप्रदेश-शासन ने ५ लाख ५० हज़ार २७० करोड़ ७८ लाख रुपये का परिव्यय कल (२३ फ़रवरी) प्रस्तुत किया था, जिनमें से २७ हज़ार ५९८ करोड़ ४० लाख रुपये की नयी योजना-परियोजनाएँ हैं; परन्तु जिस रूप में और जिस मद में जिस प्रकार से धनराशि का आवण्टन किया गया है, उससे ‘मध्यम वर्ग’ की कमर टूटती नज़र आ रही है।

पिछले दिनों ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ने केन्द्रीय परिव्यय प्रस्तुत कर, जिस अर्थहीन-भावहीन मनोवृत्ति का परिचय दिया था, उससे जनता उबर ही नहीं पायी है कि सर्वाधिक जनसंख्यावाले देश के राज्य उत्तरप्रदेश में आदित्यनाथ योगी ने ‘मध्यम वर्ग’ को परिव्यय के निर्मम चाबुक से मारकर आहत कर दिया है।

निस्सन्देह, उत्तरप्रदेश-शासन का यह परिव्यय ‘जनघाती’ है, विशेषत: मध्यम वर्ग के लिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ फ़रवरी, २०२१ ईसवी।)

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