सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

‘परीक्षा पे/पर चर्चा’ वाक्यांश-प्रयोग का औचित्य?

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इन दिनो एक वाक्यांश शिक्षाजगत् की शब्द-सम्पदा को खाने के लिए ‘जंगली कुत्ते’ की तरह से छोड़ दिया गया है। आश्चर्य है, उस कुत्ते को लठियाने की हिम्मत मरती हुई दिख रही है और सभी ‘जी-हुजूरी’ की मुद्रा मे ‘सन्न’ मारे हुए हैं। सभी उस ख़ूख़्वार कुत्ते को ‘सरकारी मेक-अप् बॉक्स’ मे रखे रंग-रोगन से सजाने-सँवारने मे दिख रहे हैं; एक तरह से होड़-सी मच गयी है।

वह वाक्यांश है― ‘परीक्षा पे/ पर चर्चा’।

हमारे देश के शिक्षालयों के संस्कृताचार्य मौन व्रत धारण किये हुए हैं; हिन्दीभाषासाहित्य तथा उसके व्याकरण और विज्ञान का अध्ययन करानेवाले प्रतिक्रियाविहीन हैं; क्योंकि वे सभी ‘विद्यादान’ नहीं कर रहे हैं, अपितु अपनी-अपनी सरकार और संस्था की ग़ुलामी कर रहे हैं, अन्यथा उस व्यक्ति-विशेष अथवा परामर्शदातामण्डल मे सम्मिलित सभी सलाहकारों से प्रश्न करते :― तुम सभी ने मिलकर जिस सरकारी परखनली की सहायता से ‘परीक्षा पे/ पर चर्चा’ वाक्यांश को जन्म दिया है, क्या वह शुद्ध और उपयुक्त है?

उस पर आश्चर्य यह कि उक्त विवादास्पद वाक्यांश के साथ उस व्यक्ति का चित्र लगा दिया गया है, जिसने “डंके की चोट पर” कहा है :― मैने शिक्षा ग्रहण नहीं की है। आठ साल का था तब घर से भाग गया था और ३७ वर्षों तक भिक्षा माँग-माँगकर खाया करता था।

हमारे शिक्षाजगत् के अध्यापिका-अध्यापक इतने ‘दिव्यांग’ हो गये हैं कि किसी शैक्षिक अभियान-संचालन के लिए उन्हें उपयुक्त और शुद्ध शब्द वा वाक्यांश के लिए परमुखापेक्षी होना पड़ रहा है; घोर विडम्बना है!

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ जनवरी, २०२३ ईसवी।)