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पेगासस जासूसी-प्रकरण : मोदी-सरकार की सेंधमारी

'मुक्त मीडिया' का 'आज' का सम्पादकीय

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इस समय देश में कोरोना, गाय, गोबर, मन्दिर-मस्जिद, मोदी-सरकार की नाकामी, महँगाई आदिक विषय नेपथ्य में जा चुके हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ पर एक ऐसा जघन्य आरोप मढ़ा गया है, जिसके चलते संसद् का मानसून-सत्र पर संकट के बादल मँडराने लगे हैं, और वह विषय है, ‘मोदी-सरकार के तन्त्र-द्वारा देश के प्रमुख लोग की जासूसी कराना’।

न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ पर विपक्षी राजनेताओं, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, पूर्व-चुनाव आयुक्त, पूर्व-मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, प्रतिष्ठित पत्रकारों, न्यायाधीशों तथा अन्य प्रबुद्ध-वर्ग के सम्मानित जन की निजता-हनन कराने का जो आरोप सार्वजनिक हुआ है और जिससे भारतीय संविधान का अपमान हुआ है, उसके लिए कौन उत्तरदायी है? इस प्रश्न का उत्तर देश जानना चाहता है।

नरेन्द मोदी की निरंकुशतापूर्ण शैली में शासन करने की नीति किसी से छिपी नहीं है। पिछले सात वर्षों में अपनी दोनों कार्यावधियों में ‘नरेन्द्र मोदी ऐण्ड कम्पनी’ मनबढ़ होकर अपने आचरण की सभ्यता का परिचय देती आ रही है।

हाल ही में विश्व के १७ मीडिया-संस्थानों की ओर से यह आरोप लगाया गया है कि विश्व में सरकारें प्रमुख राजनेताओं, मीडियाकर्मियों, न्यायाधीशों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं तथा अन्य प्रबुद्ध-वर्गों की जासूसी करा रही हैं। १८ जुलाई, २०२१ ई० को एक रिपोर्ट सार्वजनिक की गयी है, जिसमें यह कहा गया है कि भारत-सहित कई देशों की सरकारों ने लगभग १८० मीडियाकर्मियों, मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं तथा सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की जासूसी करा रही है, जिनमें से भारत के न्यूनतम ३८ सम्मानित लोग ऐसे हैं, जिनकी निजता का हनन मोदी-सरकार करा रही है। इस कुकृत्य के लिए इस्राइल की कम्पनी एन० एस० ओ० समूह के हैकिंग सॉफ़्टवेअर ‘पेगासस’ का उपयोग किया गया है। एन० एस० ओ० का कहना है कि पेगासस सॉफ़्टवेअर सिर्फ़ सरकारों अथवा सरकारी एजेंसियों को दिया जाता है। सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, पनामा और मैक्सिको की सरकारें उक्त सॉफ़्टवेअर का उपयोग करती हैं। उक्त कम्पनी का यह दावा है कि इसके उपयोग करनेवालों में ५१ प्रतिशत सरकारी गुप्तचर एजेंसियाँ हैं और ३८ प्रतिशत वे एजेंसियाँ हैं, जो क़ानून लागू करवाती हैं। इसका ११ प्रतिशत सेना में इस्तेमाल किया जाता है। एन० एस० ओ० कम्पनी की बातों पर यदि विश्वास किया जाये तो आतंकवादियों की गतिविधियों पर नज़र बनाये रखने और आतंकी घटनाओं पर नियंत्रण करने के लिए उक्त सॉफ़्टवेअर का विकास किया गया है।

अब जानिए, ‘पेगासस’ को
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‘पेगासस’ एक मैलवेयर है, जो आइ फ़ोन और एण्ड्राइड डिवाइस को अपने क़ब्ज़े में ले लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि जो व्यक्ति स्मार्ट फ़ोन अथवा कम्प्यूटर अथवा लैपटॉप में ‘मैलवेयर’ भेजने का काम करता है, वह उस फ़ोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप में संगृहीत संदेश, चित्र, तथ्य-आँकड़ों, निजी सामग्री, ई० मेल आदिक को देख सकता है और उनका दुरुपयोग भी कर-करा सकता है। ‘पेगासस’ मैलवेयर इतना शातिर है कि वह एक फ़ोन से दूसरे फ़ोन की आवाज़ का ध्वन्यांकन कर सकता है। इसके लिए उक्त सॉफ़्टवेअर से फ़ोन के माइक को गोपनीय ढंग से सक्रिय किया जा सकता है। इसका सॉफ़्टवेअर गोपनीय तरीक़े से फ़ोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप तथा अन्य उपकरणों की सुरक्षा-व्यवस्था में सेंध लगा सकता है। इतना ही नहीं, उपयोगकर्त्ता की अनुमति के बिना भी उसकी समस्त सामग्री को किसी अन्य ‘डिवाइस’ में स्थानान्तरित कर सकता है।

अब प्रश्न यह है, मीडिया-संस्थानों को उपर्युक्त जासूसी-काण्ड की जानकारी कैसे हुई थी? वास्तव में, पेरिस में एक मीडिया-संस्थान है, जिसका नाम ‘मीडिया एन० जी० ओ० फॉरबिडन स्टोरीज़ ऐण्ड एमनेस्टी इण्टरनेशनल’ है। किसी ने किसी तरह से सूचना में सेंध लगा दी थी, जिसके फलस्वरूप उक्त शर्मनाक काण्ड के सभी तथ्य और आँकड़े इस संस्थान तक पहुँचा दिये गये थे। इतना ही नहीं, वैश्विक फ़ोन टैपिंग काण्ड से सम्बन्धित समस्त जानकारी विश्व के प्रमुख समाचारपत्रों :– ‘वाशिंगटन पोस्ट’ और ‘द गार्जियन’ के पास भेज दी गयी थी। इतना ही नहीं, विश्व के १७ प्रमुख मीडिया-संस्थानों के पास सारी जानकारी पहुँचा दी गयी थी। यह बताया जा रहा है कि एन० एस० ओ० अपने पेगासस सॉफ़्टवेअर के माध्यम से वर्ष २०१६ से जासूसी कर रहा था। जो जानकारी छनकर आ रही है, उससे ज्ञात हुआ है कि निजता-हनन के लिए ५० हज़ार से अधिक फ़ोन नं० की सूची बनायी गयी थी।

भारत में फ़ोन टैपिंग का इतिहास बहुत पहले का है, जिसके परिणाम भी देखने को मिले हैं। अपने राजनैतिक विरोधियों के फ़ोन टैप कराने के आरोप में कर्नाटक के मुख्यमन्त्री रामकृष्ण हेगड़े को वर्ष १९८८ में सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। वर्ष १९९१ में तत्कालीन प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर पर फ़ोन टैपिंग का आरोप मढ़ा गया था। वह प्रकरण इतना गम्भीर था कि चन्द्रशेखर की सत्ता भी चली गयी थी।

वर्तमान स्थिति भी भयावह दिख रही है। ‘द हिन्दू’ ने उद्घाटित किया है कि बंगाल की मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, पूर्व-चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, चुनावी रणनीतिकार प्रशान्त किशोर, केन्द्रीय मन्त्री अश्विनी वैष्णव तथा प्रहलाद पटेल के मोबाइल नम्बर की जासूसी का अन्देशा ज़ाहिर किया गया था। वहीं ‘द वायर’ ने इस तथ्य को सार्वजनिक किया था कि वर्ष २०१९ में राहुल गांधी के दो परिचित अलंकार सवाई और सचिन राव के मोबाइल नम्बरों की जासूसी करायी गयी थी।

प्रश्नों के घेरे में मोदी-सरकार–

प्रमुख विपक्षी दल ‘काँग्रेस’-सहित अन्य दलों के प्रमुख नेताओं ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर प्रश्नों के बौछार शुरू कर दिये हैं, जिनमें से प्रमुख हैं :–
(१) क्या चुनाव आयोग, विपक्ष के नेता राहुल गांधी-सहित, मोदी-सरकार के केन्द्रीय मन्त्रियों, पत्रकारों, मानवाधिकार आयोग के कार्यकर्त्ताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के फ़ोन टैपिंग कराकर जासूसी कराना ‘राष्ट्रद्रोह’ नहीं है?
(२) वर्ष २०१९ के लोकसभा-चुनाव से पूर्व और उसके पश्चात् प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और गृहमन्त्री अमित शाह जासूसी करवा रहे थे?
(३) भारत-सरकार ने इस्राइली जासूसी सॉफ़्टवेअर पेगासस कब ख़रीदा था? क्या इसके लिए अमित शाह ने अनुमति दी थी और इसमें कितने हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे? वे रुपये सरकार के पास कहाँ से आये थे?
(४) नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को जब वर्ष २०१९ से २०२१ तक इसकी जानकारी थी तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह चुप क्यों रहे? भारत-सरकार ने चुप्पी क्यों साध रखी थी?
(५) क्या इस शर्मनाक प्रकरण के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की भूमिका की जाँच नहीं की जानी चाहिए?

इतना ही नहीं, इस पूरे प्रकरण के संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा-सांसद सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने अपनी ही पार्टी के विरुद्ध आरोप लगाकर भारतीय राजनैतिक मंच को चौंका दिया है। उन्होंने एक ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने लिखा कि पेगासस एक कॉमर्शियल कम्पनी है, जो रुपये लेकर ही काम करती है, इसलिए एक प्रश्न लाज़िमी है– भारतीय लोग पर जासूसी के लिए उन्हें रुपये किसने दिये थे? यदि भारत-सरकार ने नहीं दिये थे तो आख़िर किसने दिये थे? मोदी-सरकार को इसका उत्तर देश की जनता को देना चाहिए।

सच तो यह है कि जब से ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ का गठन हुआ है तब से वह अपनी अहम्मन्यता का परिचय देती आ रही है और गुण्डागर्दी की सारी सीमाएँ पार कर चुकी है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जिस निरंकुशता का परिचय देते हुए, विपक्षी दलों की लोकतन्त्रीय आवाज़ को दबाते आ रहे हैं या फिर उसके प्रति अपने कानों को बन्द किये हुए हैं, उसे देश की जनता भली प्रकार से समझ चुकी है। ऐसे में, यदि मोदी-सरकार अपने तन्त्र का दुरुपयोग करते हुए विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं, प्रमुख न्यायाधीशों, पत्रकारों, अपने ही केन्द्रीय मन्त्रियों, मानवाधिकार कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं आदिक की निजता का हनन किया है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसकी जाँच किसी स्वतन्त्र एजेंसी से कराने की आवश्यकता है।

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(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ जुलाई, २०२१ ईसवी।)