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‘पेगासस’ जासूसी-काण्ड अब उच्चतम न्यायालय के हाथों में

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

पिछले कुछ महीने से बहुचर्चित जासूस-काण्ड ‘पेगासस’ ठण्ढाया हुआ था। इसके पीछे बात यह थी कि उच्चतम न्यायालय ने ‘न्यू इण्डिया मोदी-सरकार’ को शपथपत्र प्रस्तुत करते हुए, अपना संतोषजनक पक्ष प्रस्तुत करने का समय दिया था, जबकि कथित सरकार इस गम्भीर विषय को हलके में लेकर समाप्त कराना चाहती थी। उच्चतम न्यायालय ने उक्त जासूसी-प्रकरण का विधिवत् अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि यह विषय तो ‘जनहित’ का है, जिसमें देश के नागरिकों के जीने का अधिकार’ और ‘निजता का हनन’ किया जा रहा है। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय को गम्भीर होने के लिए मोदी-सरकार ने बाध्य कर दिया, जिसका परिणाम उच्चतम न्यायालय की ओर से गठित जाँच-समिति है।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन० वी० रमन्ना की अध्यक्षता में मुख्य न्यायाधीश-सहित तीन न्यायाधीशों– सूर्यकान्त और हिमा कोहली ने ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’-द्वारा देश के प्रमुख न्यायाधीशों, पत्रकारों, राजनेताओं तथा अन्य गण्यमान्य व्यक्तियों के फ़ोन की जासूसी कराने के कृत्य को अति गम्भीरता से लेते हुए, ‘पेगासस’ की वास्तविकता को सामने लाने के लिए आज (२७ अक्तूबर) जाँच का आदेश कर दिया है, जिसके अनुसार उच्चतम न्यायालय के अवकाशप्राप्त आर० वी० रविन्द्रन् की अध्यक्षता में उपर्युक्त घिनौने काण्ड की जाँच होगी, जिसमें दो साइबर-विशेषज्ञ-सहित तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। यह समिति ‘निजता के अधिकार के उल्लंघन’ की जाँच करेगी। न्यायालय ने भारत के नागरिकों की निगरानी में विदेशी एजेंसी की संलिप्तता को बहुत गम्भीर विषय माना है। स्मरणीय है कि ३०० से अधिक सत्यापित भारतीय फ़ोन नम्बर ‘पेगासस स्पाइवेअर’ का उपयोग कर देश के प्रमुख व्यक्तियों, राहुल गांधी-सहित पक्ष-विपक्ष के अनेक राजनेताओं के फ़ोन टैप कराया गया था। इतना ही नहीं, वैश्विक स्तर पर ऐसे फ़ोन नम्बर की संख्या ५० हज़ार है, जिनमें ‘पेगासस’ उपकरण से सेंध लगायी गयी थी। ज्ञातव्य है कि ‘पेगासस’ इस्राइल की ‘एन० एस० ओ०’ समूह कम्पनी निगरानी करनेवाला एक ‘स्पाइवेअर’ है। यदि यह ‘पेगासस’ किसी फ़ोन में एक बार डाल दिया जाता तो वह उसकी सभी फ़ाइलें, ई० मेल, सम्पर्क-सूची, स्थिति, संदेश आदिक की खुफ़िया निगरानी करता रहता है। उस उपकरण के माध्यम से किसी के भी फ़ोन के श्रव्य-दृश्य का ध्वन्यांकन किया जा सकता है। यही कारण है कि मोदी-सरकार पेगासस-जाँच के लिए स्वयं की समिति गठित करना चाहती थी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया था। जाँचसमिति में साइबर-विशेषज्ञ के रूप में आलोक जोशी और सन्दीप ओबेरॉय को सम्मिलित किया गया है। इतना ही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने जाँच-समिति को विशेष अधिकार देते हुए, निजता का हनन, जीने का अधिकार आदिक को लेकर उसे कैसे सुदृढ़ बनाया जाये, इस पर भी अपने सुझाव देने और संस्तुत करने को कहा है। उच्चतम न्यायालय ने जासूसी-प्रकरण की वास्तविकता को सामने लाने के लिए सम्बन्धित अन्य एजेंसियों की सहायता लेने का भी मार्गप्रशस्त कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने जाँचसमिति को आठ सप्ताहों में विधिवत् जाँच कर अपनी रिपोर्ट देने का आदेश किया है।

समरणीय है कि बहुचर्चित जासूसी-काण्ड ‘पेगासस’ के अन्तर्गत ‘निजता-हनन’ को लेकर भुक्तभोगियों-सहित अन्य की १२ याचिकाएँ उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत की गयी थीं, जिनमें कथित मोदी-सरकार पर अवैध तरीक़े से अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के फ़ोन को टैप कराने का आरोप है। याचिकाएँ एडिटर्स गिल्ड ऑव़ इण्डिया, पूर्व-वित्तमन्त्री यशवन्त सिन्हा, परंजाय गुहा ठाकुरता, पूर्व आई० आई० एम० प्रोफ़ेसर जगदीप चोककर, पत्रकार एन० राम, एस० एन० एम० आब्दी, अधिवक्ता एम० एल० शर्मा, मा० क० पा०-सांसद जॉन ब्रिटास, नरेन्द्र मिश्रा, रूपेश कुमार सिंह। यह प्रकरण उस समय चरम पर पहुँच गया, जिस समय १३ सितम्बर को उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान मोदी-सरकार की ओर से सुस्पष्ट शब्दों में कह दिया गया था कि यह सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं है, इसलिए वह इस प्रकरण में शपथपत्र प्रस्तुत नहीं करेगी। यह एक प्रकार से ‘न्यायालय की अवमानना’ भी थी।

अपने आदेश को प्रसारित करते हुए, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने इस आशय की बात कही है कि मोदी-सरकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था; किन्तु इस प्रकरण पर सरकार ने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया था; प्रकरण पर उसका रुख़ साफ़ नहीं था, लिहाजा हम देश की सुरक्षा और अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की निजता के हनन के कृत्य की अनदेखी नहीं कर सकते; हम मूक दर्शक नहीं रह सकते। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के इस कथन से– इस विषय में केन्द्र-सरकार की ओर से कोई विशेष खण्डन नहीं किया गया है। इस प्रकार हमारे पास याचिकाकर्त्ताओं के तर्क को प्रथम दृष्ट्या स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और हम एक विशेषज्ञ-समिति नियुक्त करते हैं, जिसका कार्य उच्चतम न्यायालय-द्वारा देखा जायेगा– मोदी-सरकार के प्रति उच्चतम न्यायालय की घोर नाराज़गी और असंतुष्टि साफ़-साफ़ दिखती है। उच्चतम न्यायालय ने जब अपना निर्णय सुनाया था तब उसमें कथित सरकार-द्वारा अपने बचाव में राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क को प्रस्तुत पर आपत्ति जतायी थी। इस पर न्यायालय का कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चिन्ताओं को उठाकर राज्य को हर बार राहत नहीं दी जा सकती। केन्द्र को यहाँ अपने पक्ष को सुस्पष्ट ढंग से प्रस्तुत करना चाहिए, न कि न्यायालय को ‘मूक दर्शक’ बने रहने के लिए कहना चाहिए। निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी मोदी-सरकार की निरंकुशता के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ है। स्मरणीय है कि मोदी-सरकार ने इस प्रकरण में यह कहते हुए विस्तृत शपथपत्र प्रस्तुत करने से इंकार कर दिया था कि यह विषय ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से सम्बन्धित है।

उल्लेखनीय है कि कथित मोदी-सरकार की निरंकुशता के परिचय देनेवाले ‘पेगासस’ जासूसी-काण्ड को लेकर देश के समस्त प्रतिपक्षी दलों, विशेषकर काँग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी ने अपना ज़बरदस्त विरोध सार्वजनिक किया था। इतना ही नहीं, नरेन्द्र मोदी के सत्ताधारी दल ‘भारतीय जनता पार्टी’ और उसके सहयोगी दलों के कुछ नेताओं-द्वारा भी मोदी-सरकार के उक्त कृत्य की निन्दा करते हुए, विरोधी दलों-द्वारा जाँच की माँग का समर्थन किया गया था। पिछले संसद्-सत्रों में विपक्षी दल एक स्वर में ‘पेगासस’ जासूसी-काण्ड पर संसद् में चर्चा कराने की माँग की थी, जिसे कथित सरकार ने मना कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अपने इस आदेश को सार्वजनिक कर, मोदी-सरकार तक यह संदेश अच्छी तरह से प्रेषित कर दिया है कि व्यक्ति कितना ही प्रभावकारी हो; किन्तु देश की सम्प्रभुता और अक्षुण्णता का हनन करनेवाले किसी भी कृत्य को बरदाश्त नहीं किया जायेगा। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि यह सूचना-प्रौद्योगिकी का युग है और यह हमारे दैनिक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है। जब निजता के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है तब उसे संवैधानिक सुरक्षा-उपायों से बँधा होना चाहिए। मोदी-सरकार के तर्क को काटते हुए, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निजता पर प्रतिबन्ध केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में आतंकी गतिविधियों पर नियन्त्रण करने के लिए लगाया जा सकता है।

ज्ञातव्य है कि प्रथम दृष्ट्या उक्त जासूसी-प्रकरण में मोदी-सरकार दोषी मानी जा रही है। जाँच होने के बाद सभी रहस्य उद्घाटित हो जायेंगे।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ अक्तूबर, २०२१ ईसवी।)
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