सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

दार्शनिक दृष्टिकोण

बहुत ‘पुण्य’ करने पर ही ‘न्याय’ प्राप्त होता है।
बहुत ‘न्याय’ करने पर ‘प्रेम’ प्राप्त होता है।
बहुत ‘प्रेम करने पर ‘सत्य’ प्राप्त होता है।
सत्य ही परम उपलब्धि है।

सत्य उपलब्ध होने पर मानव जीवन पूर्णता को प्राप्त हो जाता है..!
सत्य में ही मुक्ति, मोक्ष, स्वस्ति, तृप्ति, तुष्टि, शान्ति, निर्वाण, स्वतंत्रता, स्वामित्व, ईश्वरत्व, समाधि, परमधाम, परमपद, ब्राह्मणत्व, ब्रह्मत्व प्राप्त होता है..!

पापियों के जीवन में न्याय नहीं होता..!
क्योंकि पाप से ही अन्याय का जन्म होता है..!!
अन्याय से ही घृणा उत्पन्न होती है, प्रेम नष्ट हो जाता है..!!
घृणा से ही दोष, दैत्यता, दासता, दुराव, शत्रुता, विवाद, युद्ध, विनाश, मृत्यु, मिथ्यत्व उत्पन्न होता है..!!!
पथभ्रष्ट मनुष्य की यही असत् दशा है…!!!!

कर्म करने से कर्मों की छाप हृदय पर पड़ती है। इसे ही ‘संस्कार’ कहते है। यह ‘संस्कार’ ही ‘संचितकर्म’ कहलाता है। यही आदत, गुण, स्वभाव, प्रकृति इत्यादि के रूप में व्यक्त होता है! इसी से सृष्टि होती है, इसी से संसार चलता है।
ये कर्मो द्वारा संचित संस्कार दो प्रकार के होते हैं-सुसंस्कार और कुसंस्कार। जो सुसंस्कार है वह ‘पुण्य’ है किन्तु जो कुसंस्कार है वह ‘पाप’ कहलाता है।

‘कर्मसंचय’ ही ‘प्रारब्ध’ है। प्ररब्ध ही ‘भाग्य’ कहलाता है। यह प्रारब्ध दो प्रकार से पुण्य अथवा पाप के रूप में संचित होता है।
सत्कर्म से ‘पुण्य’ संचित होता है।
दुष्कर्म से ‘पाप’ संचित होता है।
पुण्य से सौभाग्य और पाप से दुर्भाग्य बनता है..!!

अतः प्रारब्ध को अवश्य ही कर्म द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है।
पुण्य की वृद्धि से पाप क्षीण होते हैं और पाप की वृद्धि से पुण्य क्षीण होते हैं।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)