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जड़बद्ध आचरणजगत् का दर्शन

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—- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

यह विडम्बना ही है कि अद्वैतवादी सिद्धान्त और अभेदमूलक विचार की जन्मभूमि में ही आरम्भ से भेदमूलक समाज रहा है। यहाँ सिद्धान्त और व्यवहार के मध्य एक गहरी खाई रही है। सम्भव है कि वर्ण-व्यवस्था का आरम्भिक रूप एक आदर्श के रूप में रहा हो; किन्तु वर्ण-व्यवस्था ने जाति-व्यवस्था को जन्म देकर, भारत पर गम्भीर अपकार किया है। वृक्ष पर दृष्टि निक्षेपित करने पर उसकी शाखाएँ और पत्तियाँ लक्षित होती हैं; किन्तु उसकी जड़ें अलक्षित रहती हैं। उसी प्रकार व्यक्ति पर दृष्टिपात होने से उसका व्यक्तित्व और आचरण समक्ष उभरता है; किन्तु उसका विचार दृष्टि-पटल पर अंकित नहीं हो पाता। विचार ही मनुष्य की जड़ है। यदि विचार की जड़ों को व्यवस्था से असम्पृक्त कर दिया जाये तो ‘आचरण’ स्वतः पंगु हो जायेगा।

वृक्ष के प्राण उसकी जड़ में बसते हैं और राष्ट्र के प्राण लोक के विचार में। जाति-प्रथा को अपनाकर भारत ने विचार के धरातल पर आत्मघात कर लिया है, जिसके कारण आचरण के तल पर वह ‘बौना’ बनता जा रहा है। जाति-प्रथा चुनाव-प्रणाली-रूपी द्रौपदी का चीर-हरण कर रही है, जो गणतन्त्रीय लोकतन्त्र के लिए एक बहुत ही भयावह संकेत है। ऐसे में, हमारा ‘बुद्धितत्त्व’ सहायक सिद्ध होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ दिसम्बर, २०२० ईसवी।)