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प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की ‘मन की बात’ से उजागर होती संवेदनशून्यता

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय

किसी देश का प्रधानमन्त्री सरकारी प्रायोजित कार्यक्रम ‘मन की बात’ में मूलभूत समस्याओं की बात न कर, ‘बचकानी’ बात करे तो उसका वैचारिक और बौद्धिक धरातल कितना संकीर्ण और स्वपक्ष-पोषक है, उनको सहजता के साथ समझा जा सकता है। आज जहाँ कोरोना के संक्रमण से प्रतिदिन हज़ारों लोग संक्रमित हो रहे हैं और मर रहे हैं, उसके प्रति देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी चुप्पी साधे हुए हैं; अभी तक किसानों को घोषित समर्थनमूल्यों पर उनके खाद्यान्न की बिक्री नहीं हो रही है, इस पर मोदी मौनी बाबा बने हुए हैं; लगभग देश का आधा भाग बाढ़ के प्रकोप से “त्राहि-त्राहि” कर रहा है, जिसकी मोदी अनदेखी कर गये; कोरोना के चलते देश की जनता निरुपाय दिख रही है, जबकि एक लोकतन्त्रीय देश का प्रधानमन्त्री ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ है। किसी देश के मुखिया के लिए यह नितान्त लज्जा का विषय है।

नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ में ‘खिलौना’ बनाकर आत्मनिर्भर बनने की बात कहकर उन लोग का ख़ून खौला दिया है, जिनके पेट में भोजन का एक निवाला तक नहीं पहुँच रहा है। यह संक्रमणकाल में एक प्रधानमन्त्री का थोथा उपाय जले पर नमक छिड़कने के समान है। कोरोना, बाढ़, नीट और जी-परीक्षाएँ मोदी को याद नहीं रहीं; किसानों और बेरोज़गारों का दर्द याद नहीं रहा; जिन लोग को ‘कोरोना’ के प्रभाव से कम्पनियों की आर्थिक स्थिति बदहाल होने के कारण नौकरियों से हटा दिया गया है, उनके प्रति मोदी ने एक शब्द तक नहीं कहा।

तो मुसीबत के मारे भक्त लोग! बजाओ थाली और मारो ताली और अपना-अपना भगवा हिला-हिला उच्चारो– नमो-नमो। अभी बहुत दुर्दशा होगी, देखते रहो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० अगस्त, २०२० ईसवी।)

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