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उठा है जो तूफ़ान क़ह्र बरपायेगा बेशक

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आँखों-ही-आँखों में बात हो जाने दो,
बातों-ही-बातों में रात हो जाने दो।
बनने-सँवरने लगे ख़यालात के झरोखे,
रातों-ही-रातों में मुलाक़ात हो जाने दो।
ज़मानाए दराज़१ जुस्तजू अधूरी रही,
चाहत दीदार का, शह-मात हो जाने दो।
आँखों में हया डाल नज़र मिलाते रहना,
निगाहों में अब यहाँ बरसात हो जाने दो।
उठा है जो तूफ़ान क़ह्र बरपायेगा बेशक,
दिले मुज़्तरिब२ में जज़्बात हो जाने दो।

शब्दार्थ– १दीर्घ काल से २व्यथित हृदय।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज ; १२ जून, २०२० ईसवी)