पति के मामू ने किया बलात्कार, पीड़िता ने डीजीपी से की शिकायत

एक अभिव्यक्ति

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
जीव-जगत् भ्रमजाल में, ब्रह्म निकटता खोय।
मानव दानव बन गया, फिर काहें को रोय।।
दो–
रूप-रूपसी-दंग है, दिखता ज्ञात अज्ञात।
सार-सार से रहित है, मानव दिखे न ज्ञात।।
तीन–
विष-वल्लरी सृष्टि में, होता दूषित वात।
जीवनरूप विरूप है, कलुष दिखे है गात।।
चार–
कृष्णपक्ष-कालुष्य दिखे, मन-मानस उद्विग्न।
सन्त सरोरुह सत्य सम, जीवन में है विघ्न।।
पाँच–
लोभ-मोह से परे रह, बढ़ते जाओ मीत।
यह जीवन-संसार है, मिल-जुल गाओ गीत।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ जुलाई, २०२० ईसवी)

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