कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

कविता : वक्त

राजन कुमार साह ‘साहित्य’
मिथिला नगरी, जिला: मधुबनी, बिहार

एक वक्त था,
मेरा वक्त था,
मेरे पास वक्त नहीं था ।
एक वक्त है,
मेरे पास वक्त है,
मेरा वक्त नहीं है ।
कहते हैं,
वक्त, वक्त की बात है
आज कोई अर्श
तो होता कोई फर्श पर है ।
मगर नहीं?
ऐसे नहीं बदलता है वक्त
वक्त को बदलने के लिए
वक्त को देना होता है वक्त
अफसोस, होता नहीं वक्त ।
भले किसी के पास होता नहीं वक्त
वक्त तो वक्त है
और आपको होता भी ज्ञात है,
वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता
बल्कि वक्त का इंतजार सबको करना पड़ता है ।
ये वक्त है जो नूर को बेनूर बना देता है
छोटे से जख्म को भी नासूर बना देता है ।
पर अब पछताए होत क्या
ये तो वक्त का वसूल है
करोगे बर्बाद वक्त
तो बर्बाद करेंगे आपको वक्त
और जब देखोगे बर्बादी का नजारा
जिंदगी कराएगी नृत्य
ढ़ोल बजाने वाले होंगे अपने
बिखरते नजर आएंगे सारे सपने
फिर होगी कदर
काश वक्त को वक्त
दिए होते उस वक्त
शायद देखने ना पड़ते ऐसे वक्त ।
वक्त की किमत समझ है आई
जब व्यर्थ में गंवा चुके है काफी वक्त ।
बुरे वक्त का ये मंजर देखने
सब पराए हो चुके है जो थे कभी अपने
हर वक्त का एक वक्त होता है
इस वक्त को भी आना था
कौन है अपना, कौन पराया
पहचान करवाना था ।
ऐसे विपरीत वक्त में होता जो साथ है
सब होते अपने है
बाकी सब होते सपने है ।
अतएव खुद को वक्त देना सीखो
वक्त को वक्त देना सीखो
अतीत को भुलाकर,
वर्तमान में जीना सीखो
वक्त के साथ चलना सीखो ।
जिंदगी मौके कम,धोखे ज्यादा देती है
अतः जो कुछ हासिल करना है,
वक्त पर हासिल करना सीखो ।
जब तक सफलता ना मिले,
नींद और चैन को त्याग करना सीखो
आएंगी बाधाएं असंख्य,आगे बढ़ना सीखो
बुरे वक्त में भी सुनहरे वक्त की कल्पना करना सीखो ।
है बुरा वक्त अच्छा वक्त भी आएगा
बस वक्त को वक्त देना सीखो ।।