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‘छठि’ याद अवला से अँखिया में बचपन जीये लागल!

डाकेटर पिरीथिबीनाथ पाँड़े-

‘छठि’ के नउवा सुनि के आपन गाँव, घर, दुआरि, डेरा, खरिहान, बर-बनिहार आ पाँड़े पोखरा याद आवे लागल। मुँड़ी पर फल-फूल, सिंघाड़ा, ठेकुआ, पूआ-पूड़ी, ठेकुआ, भीगल चाना, उखि के गेंड़, सिंहाड़ा, नीबू, पटउरा, सरीफा, मुरई (पतई लेके) तिल-तिलौरी, गूर, बतासा खुटकी, लचिदाना, कोन, सिंहाड़ा के हलुआ से भरल सूप, सूपली, दीया-दीयरी, अगरबत्ती, आ रँगल-चँगल बड़की डलिया-दौरी रखल सब याद आवे लागल।

लोरि रुके के नाव नइखे लेत। गँउआ के आपन बचपन अँखिया में जीये लागल। उहो एगो समय रहे। अब त सब हेनर-बेनर होई गईल। जब अपने खूनवा पटीदार बनल बुझाए लागल त औरी के का कहल जाई। अपने घरवा के लोगवा एतना चटक आ चटकोर लउके लागल कि मानवाँ फाटे लागल।

ना अब गाँव बा, ना घर बा आ ना दुआरि रहल; ना डेरा बा, ना खेत बा, ना खरिहान बा, ना गाइ बा, ना बैल बा, ना बछवा-बछिया बीया, आ नाहीं बाग-बगइचा बा। सब बिलाइ गइल, उधियाइ गईल। सब बेकति मरि गइल, आ जीअतो मरला लेखा बुझाये लागल। हेराइ गइल; बिछुड़ि गइल; भुलाइ गइल गँउवा के डाँड़-डँड़ार। अब त केहू के खोजहूँ के मन ना करेला। जब दियानत में कवनो खोटि आ जाला नू त मनवा सब केहू से फाटि जाला। ना उधो के लीहल आ ना माधो के दीहल। ना मूअला में आ न जियला में। एही से नू कहल जाला, एइजा सब केहू स्वारथ के पुतला बा।

आ ईहो साँचि बा ओने की ओर से आपन जिनगी बैरंग चिट्ठी-पतर लेखा होई गइल बा।

इ त एगो हावा के झँकोर हवे आ भाव के हिलोर हवे। मनवा ना मानल ह त लिखि देहनी हाँ; बाकिर इहो बतिया सही बा कि इ पानी के बुदबुदवा हवे, जलदिये फूटि जाई।

जइसे घाव पाकि जाला त फोड़ा बनि जाला आ अचके में फूटि-फाटि के अकोर हो जाला; ओही तरी, हमार छठि आ घरि-दुआर के मोह फूटि-फाटि के अकोरि होइ गइल बीया। साँचो कहीं त अब ना त छठि मइया बाड़ी आ ना साँचका पूजाई। खाली बा त एगो डरि बा; जब तक जीयत बाड़ू मनावत रह छठि के।

कुछू बुझाइल कि ना हो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ अक्तूबर, २०१९ ईसवी)