कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

हम सबब सोच रहे हैं

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक भीगी हुई शाम की दहलीज़ पे बैठे,
हम उनकी मक्कारी का सबब सोच रहे हैं।
सियासी जाल में उलझ कर रह गयी ‘हिन्दी’,
हम ज़ह्रीली नीयत का सबब सोच रहे हैं।
कहते जिन्हें कर्णधार, कुण्ठा से हैं ग्रस्त,
हम उनकी लाचारी का सबब सोच रहे हैं।
अँगरेज़ तो गये, पर अँगरेज़िअत है यहीं,
हम सियासी बीमारी का सबब सोच रहे हैं।
हमारी पाक़ीज़गी सरे आम नीलाम होती है,
हम उनकी दुनियादारी का सबब सोच रहे हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज, २१ जुलाई, २०२० ईसवी)