हा! हा! किसान, छोड़ूँ निशान

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज)

खोलो खोलो अपनी पलकें;
क्यों प्रगति देख जियरा धड़के?
तू उगा कर अन्न बना दाता;
फिर भी ना ब्याज़ चुका पाता।
जो देता हूँ ले पकड़ दाम;
मत व्यर्थ प्रगति का चक्र थाम।
क्यों फटेहाल थामे मशाल?
है बुला रहा निज सर्वनाश।
नित बेंच रहा मैं नवविहान।
हा!हा! किसान……..

तू कहता खुद को राष्ट्र-रीढ़;
क्यों भूल रहा अस्तित्त्व ढीठ?
चींटी हो सहज़ मसलने को;
करो मत बाध्य निगलने को।
आशाएँ तत्पर डिगने को;
तैयार रहो नित बिकने को।
जो देता उसे भाग्य समझो;
मत व्यर्थ मूर्ख मुझसे उलझो।
मत शोर मचा टूटी मसान।

हा!हा! किसान……..

अनवरत् चल रहा है विकास;
हठी चाहता अपना विनाश।
मत बाँध मूर्ख समय-गति को;
तन बेंच-बाँच सत्ता-रति को।
मर्यादा की न लकीर खींच;
अपने खूँ से यह नीवँ सींच।
तू भूल स्वयं अस्तित्व मात्र;
तू है केवल कुदाल-पात्र।
केवल चुप रहना ही निदान।

हा!हा! किसान……..

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