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वक़्त-बेवक़्त

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

हमने जब सोचा,
चैन से कट जायेगा
ज़िन्दगी का हर पल।
समय ने दस्तक दी;
एक गह्वर में डाल दी गयी,
बटोरी हुई साँस;
फ़ज़ा में उड़ा दी गयीं,
मेरी बची-खुची रातें।
मैं ठगा-सा देखता रह गया
वक़्त की बाज़ीगरी!

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ फ़रवरी, २०२१ ईसवी।)

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