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बँटवारे का दंश!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

विश्वास की डोर थामे
सरक रहा था
लक्ष्य की ओर—
तन-मन में
आशंकाओं की झंझावात समेटे
डोर की मध्य-बिन्दु के स्पर्श की अनुभूति
बाहर से भीतर तक
सिहरन भरती जा रही थी।
अचानक…. सहसा!
विश्वास की कुटिल चालें
चलायमान हो उठीं।
विस्फारित नेत्रों से
कातर और उद्विग्न मन की पाँखों को
कतरता देखता रह गया!
डोर का मध्य-भाग
अपना बँटवारा कर चुका था;
किन्तु मैं,
दोनों सिराओं के लिए
त्याज्य हो चुका था।
अस्तित्व-संकट का स्मरण आते ही,
मन सिराओं से विद्रोह कर उठा।
खण्डित विश्वास की खाई में गिरने से पूर्व
स्वयं का ‘स्वयं’ के प्रति
विश्वास का जागरण
शंखनाद कर चुका था
जो अब भी मेरे कर्णरन्ध्रों में
निनादित हो रहा है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ; २९ जुलाई, २०२१ ईसवी।)
यायावर भाषक-संख्या– ९९१९०२३८७०
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