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वक़्त-बेवक़्त

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

स्याह परछाइयाँ :–
वक़्त-बेवक़्त की
चुपके से दाख़िल होती हैं,
मन के अँधेरे घर में।
घर के भार से
लहूलुहान नीवँ
कब दम तोड़ देगी
इसे वक़्त भी नहीं जानता;
क्योंकि वह जी रहा होता है,
अपना वर्तमान।
वह सहला रहा होता है,
दरार-से दिखते
मन-मानस की कोख से उपजे द्वन्द्व को।
बेवक़्त तो एक अनाहूत अतिथि है
जो हमारी नसों और शिराओं में
संचरित होते रक्त-प्रवाह को
कर देता है अवरुद्ध
और हम,
अप्रत्याशित बन्द साँकल के किवाड़-जैसे
भड़भड़ाकर रह जाते हैं मौन!

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ अगस्त, २०२१ ईसवी।)