भाव, वर्ण के समन्वय से, मैं शब्द नए पिरोता हूँ

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-

वर्ण की अँधेरी खोह में ,

नित भाव प्रसून उगाता हूँ।
भाव, वर्ण के समन्वय से,
मैं शब्द नए पिरोता हूँ ।।
शब्द जोड़ जोड़कर ,
कविता रसधार बहाता हूँ।
हिन्दी माता के श्री चरणों को,
निज दृग नीर भिगोता हूँ।।
वाग्देवी की कृपा से ही,
कविता सोपान बनाता हूँ।
कल्पना के रत्ननिधि में ,
मैं गोते प्रतिपल लगाता हूँ।।
रस,अलंकार और पर्याय से,
मैं खुद ही मिलने जाता हूँ।
हिन्दी  और हिन्दुस्तान से,
स्वयं जुड़ा हुआ ही पाता हूँ।।