कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

चाँद ने हमको पुकारा


जगन्नाथ शुक्ल ‘जगन’

नेपथ्य से जब चेतना ने, वेदना का विष पिलाया।
संदली ज़ज्बात ले कर , चाँद ने हमको पुकारा।।

अमूर्त थी जो पीर अब तक,
मूर्त हो खिंचती लकीरें।
वार देने पर तुली वो,
निज भ्रमों के सब ज़खीरे।।

सुरमई आँखों से उसने ,आँसुओं का नद उतारा।
संदली ज़ज्बात ले कर , चाँद ने हमको पुकारा।।

दो ध्रुवों पर जा खड़े हो,
कोसते थे जिन पलों को।
आये हैं सब द्वार मेरे,
तोड़ने निर्जल व्रतों को।

रूठते ना मीत यदि तुम ,जूझता ना स्वर हमारा।
संदली ज़ज्बात ले कर , चाँद ने हमको पुकारा।।

चोट खाये हृदय में फ़िर,
प्रणय का दीपक जलाया।
अनछुए पल रह गये जो,
आज फ़िर उनको बुलाया।

हर वज़ह थी जो अकारण,कर लिया उनसे किनारा।
संदली ज़ज्बात ले कर, चाँद ने हमको पुकारा।।

©जगन्नाथ शुक्ल…✍️
(प्रयागराज)