माँ : तुम मेरे जीवन के नौका की खेवनहार हो

शिवांकित तिवारी ‘शिवा’, युवा कवि एवं लेखक, सतना (म.प्र.) सम्पर्क:- 9340411563

तुम मेरे जीवन के नौका की खेवनहार हो ।

तुम ही मेरा रब हो और जीने का आधार हो

तुम ही मेरा जग हो और तुम ही सच्चा प्यार हो ।

माँ तुमने जब भी मुझको अपने सीने से लगाया है,

अद्भुत, अप्रतिम, वो पल मैनें आज भी नही भुलाया है ।

उँगली पकड़ के मेरी तुमने मुझको चलना सिखाया था,

लोरी गा-गाकर के तूने मुझको रोज सुलाया था ।

तेरी ममता के आँचल में बेफ़िक्री सो जाता था,

तू जब भी पुचकारे मैं झट से चुप हो जाता था ।

मेरी दुनिया तुमसे तुम ही तो मेरा जहान हो,

मेरे जीवन का तुम उपहार तुम्हीं वरदान हो ।

तुम हो तो मैं हूँ माँ तुमसे मेरी पहचान है,

तेरे खातिर मेरा ये सारा जीवन कुर्बान है ।

क्या कितना मैं लिक्खूं तुझ पर अब मेरी माई,

शब्दों का सैलाब लिखूँ या तुझ पर रोज किताब लिखूँ ।

तुझ पर मैं जितना भी लिक्खूं वो कम है,

इस जग में न अपना कोई माँ तेरे सम है ।

जीवन भर माई जो तेरा सर पर मेरे हाथ है,

अब न मैं कुछ चाहूँ जो हरदम मेरे तू साथ है ।

कण-कण हर क्षण जीवन का अस्तित्व तुम्हीं से है,

माँ तुम बिन न जीवन सारे जीवन का सारत्व तुम्हीं से है ।

जीवन को महकाती हो जग को तुम चमकाती हो,

तुम अद्वितीय आराध्य तुम्हीं जीना सबको सिखलाती हो ।

माँ तेरा ऋण कोई सातों जन्म उतार न पायें,

प्रथम पूज्य भगवान सृष्टि सब महिमा तेरी गाये ।।

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