दृढ़ता से बढ़ते चलो, पुरुष-अर्थ के साथ

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक―
दिखें दोगले हर जगह, हरदम करते घात।
दूरी कर लो दूर से, बने न कोई बात।।
दो―
दृढ़ता से बढ़ते चलो, पुरुष-अर्थ के साथ।
ख़ुद मे तुम भरपूर हो, नहीं बढ़ाओ हाथ।।
तीन―
हर जगह चेहरे रँगे, लीला मे हैं लीन।
रस्सी को नागिन बना, बजा रहे हैं बीन।।
चार―
जैसे को तैसा मिले, है यह जग की रीति।
वैमनस्य की छाँव मे, कैसे सम्भव प्रीति।।
पाँच―
मन के कच्चे हर जगह, कथनी-करनी दूर।
शातिर-से हैं सब लगें, आँख-सहित हैं सूर।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ मार्च, २०२३ ईसवी।)