आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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एक –
आओ! मुख़ालिफ़त सजा लेँ, क़रीने से,
मुवाफ़िक जवाब देने की ताक़त बढ़ जायेगी।
दो–
वक़्त का दरिया– ठहरा है, न ठहरेगा,
मान लूँ कैसे, गोदी मे तुम्हारे बैठा है?
तीन–
उनकी रंगीनियत का, हर सम्त ही चर्चा है,
उल्फ़त का तक़ाज़ा है, सादगी से पेश आयेँ।
चार–
ख़ैरात मे पायी इज़्ज़त, न बटोरिए साहिब!
अपने अदब में आबे कशिश और लाइए।
पाँच–
लोग खाते हैँ, दोस्ती न तोड़ने की क़सम,
वक़्त के पंख लगते ही हवा हो जाते वादे।
छ: –
कैसे कर लूँ, भरोसा इन पे साहिब!
हर सम्त चेहरे-पे-चेहरे दिखते हैँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ जुलाई, २०२५ ईसवी।)