गणितसूत्र समझाता वय-वार्द्धक्य

मन को तराशता हूँ
कसैला बिम्ब दिखता है।
बूढ़े पलंग पर लेटा वय-वार्द्धक्य
चुपके से जीने का गणितसूत्र समझाता है।
मनमोहिनी माया मस्तिष्कतन्तु को,
रुई का फाहा बनाकर
आहिस्ते-आहिस्ते सरकाती है।
अराजक ऐन्द्रियिक तत्त्व,
सक्रिय होने लगते हैं।
जीवनीशक्ति सम्पुट-अवस्था मे दिखने लगती है,
विषाक्त रसभरी-सी।
श्वासगति निस्पन्द की स्थिति मे
निष्कारण निष्कृति जीवात्मा से
संवाद न कर पाने का
प्रायश्चित्त तक नहीं कर पायी।
उसे खेद है,
निष्पक्ष निष्पत्ति न प्राप्त कर पाने का।
देह की संरक्षा मे नियोजित रोम–
रोमद्वार की अवहेलना करते हुए,
अपने रोमाग्र से–
मन-प्राण को रोमांचित किये हुए हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ फ़रवरी, २०२४ ईसवी।)