मतदान आपकी जिम्मेदारी, ना मज़बूरी है। मतदान ज़रूरी है।

घायल होती मुसकान

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

भूख से बिलबिलाती आँतें
चीथड़ों में लिपटी-चिपटी-सिमटी
अपनी पथराई आँखें पालती
टुकुर-टुकुर ताकती
आँखों से झपटने की तैयारी करती
मेले-झमेले की गवाह बनती।
आस-विश्वास की फटही झोली लिये
तमन्नाओं-अर्मानों की लाश ढोती
फफोलों से सजी हथेलियों की
रेखागणित पढ़ते
होठों को बिचकाते, फफकाते
अपने गालों पर ढुलक रही
अश्रु की व्यथा-कथा
गीली वसुधा के वक्षस्थल पर
रचती जा रही है।
उसके भीगते-सिसकते नेत्रों में
कश्मीर से कन्याकुमारी तक का
भौगोलिक संदर्भ सिमटा हुआ है।
सम्भ्रान्त जोड़े के ‘फ़ास्ट फ़ूड’ पर
टिकता-फिसलता बेबस-कमज़ोर मन
भयाक्रान्त हो उठता है;
मरमरी बाँहें सिकुड़ने लगती हैं;
पाँव सकुचाये-सहमे
लौट पड़ते हैं, अपनी खोली में।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ जुलाई, २०२१ ईसवी।)

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय