ग़ुलामो की बस्ती मे

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

चलो!
यहाँ से चलते हैं,
दुर्गन्ध भी भयानक और घृणित आ रही है।
लगता है,
मानो कोई आदमख़ोर जानवर,
मल-मूत्र मे नहाया हुआ,
इधर से अभी-अभी गुज़रा हो;
वह अपने हिंस्र नाख़ूनो से,
हर मासूम गर्भ मे हाथ मार, मासूमियत को खा रहा हो।
यहाँ ग़ुलामो की बस्ती है;
हर चेहरे पर दोगलेपन की
अमिट सभ्यता टाँकी हुई है।
कुलीन, अभिजात्य तथा सम्भ्रान्त कहलानेवाले चेहरे-मोहरे,
उस बीभत्स सभ्यता पर
ग़ुलामी की छतरी ताने हुए हैं।
कुकुमुत्तों-जैसा
एक उपनिवेश दिख रहा है।
मारो ठोकर;
धराशायी कर दो नीवँ को।
चाटुकार चमचों की लम्बी होतीं गरदनो को रेत डालो।
कैंची-जैसी,
कच्-कच् करती ज़बान को कचर डालो;
उठाओ कील और टाँग दो खूँटियों पे,
हमारी संस्कृति-सभ्यता को निगल रहे;
ख़ूँख़्वार-से दिख रहे;
इन्सानो-से दिखते; बोलते-बतियाते
जंगली जानवरों को।
ये इन्सानियत की भाषा,
समझकर भी नहीं समझते।
इनकी ज़बाँ खोलो!
और टाँक दो वे सभी शब्द,
जिनके वे आदी हो चुके हैं।
यह नमकहरामों की बस्ती है;
आँगन से द्वार तक ,
बो दो अफ़ीम के बीज।
वे चाटते रहें और बजबजाते नाली के कीड़ों-सदृश
छटपटाते रहें।
वे ज़मी पे क़दम नहीं रखते;
आसमाँ में उड़ा करते हैं।
अपने शब्दों की कैंची से
कतर डालो, एक एक का पर।
आओ!
हाथ बढ़ाओ और ख़ूनी मंज़र पर पड़े पर्दों की रस्सियों को
इतनी ताक़त से खींचो;
काँप उठे, हिंसक साम्राज्यवादी सिंहासन।
ज़रूरत है, एक ऐसे दुस्साहस की,
जो धरती से आकाश
और आकाश से पाताल तक,
बोये गये नशीले बारूद मे आग लगा सके
और भस्मीभूत कर सके,
हर ज़ालिम चेहरे को।
आओ! ठिठक रहे क़दमो को,
अपनी नैतिकता का बल-रस पिला,
ऊर्जावान् करो और अपना तीसरा नेत्र खोलो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ जनवरी, २०२३ ईसवी।)
यायावरभाषक-संख्या― ९९१९०२३८७०