आर्त्तनाद विधवाओं का

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी


ऐ मेरी देश की बहरी सरकार ! भला
कब तक तू निंदा का राग यूँ अलापेगी?
क्लीव हो चुके हैं देश के चालक सभी,
दिल्ली की सोई हुई सत्ता कब जागेगी?
मैं सुन रहा हूँ आर्तनाद विधवाओं का ,
जिनका सुहाग आज असमय उजड़ गया ।
देख रहा हूँ मैं उस मासूम बच्चे को ,
जिसका भविष्य बिना बाप के बिगड़ गया ।
सुन रहा हूँ,मैं इक अधेड़ का हृदय क्रदंन,
कंधे पे जिसके होगी पूत की जवान लाश।
रो रही है छाती में दर्द को समेटे माँ,
टूट गयी,भाइयों की ,बहनों की मधुर आश।
हिजड़ी सरकारों,भला बन के ढपोरशंख,
एक दूसरे के दोष कब तक गिनाओगे?
चूड़ी पहन के बीबियों की बैठ जाओ घर,
कब तक यूँ मंचो पे गाल तुम बजाओगे ?
जनता का खून पीके ,एसी में जीने वालों,
आज इस देश का जवान मजबूर है ।
मगर याद रक्खो बस बात कुछ दिनों की है,
अगला संसद चुनाव ज्यादा नही दूर है ।