कब तक मरेगी?

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव

प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24

कल भी मरी थी कल भी मरेगी!

आख़िर वो कितनी बार जलेगी?

पहले तो तन को भेड़िया बन नोच डाला।

शरीर से आत्मा तक छेद डाला ।

लाश बच रही थी न जियेगी न मरेगी।

आख़िर वो कितनी बार जलेगी?

घर से बाहर तक हर कोई याद दिलाता है।

दर्द बांटना तो दूर दर्द को खरोंच-खरोंच नासूर बनाता है।

क्या घर में भी वो इसी तरह लुटेगी?

आख़िर वो कितनी बार जलेगी?

उसकी आँखों मे सहमे आँसुओं के क़तरे।

टूट-टूटकर गिरते एक-एक कर सपने।

कब तक ये मानसिक रोगियों की शिकार बनेगी?

आख़िर वो कितनी बार जलेगी?