कहाँ सो रहा शौर्य है, सीना दे जो चीर?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


एक :
ज़बान पर अंकुश नहीं, कैसे हैं ये लोग!
प्रेमरोग से विकट है, नेता का संयोग।।
दो :
नेता-रोग है प्लेग, घर-घर घुसणम होय।
देश को चाटें घुन-सा, जन-जन अब है रोय।।
तीन :
घर की खेती जान के, रौंदे जन को रोज़।
पतन लाज की हो रही, यही नयी है खोज।।
चार :
धर्म देश को बाँट रहा, नहीं किसी को होश।
ऊपर-ऊपर रोष है, भीतर सब बेहोश।।
पाँच :
चाल-चरित्र अन्तर नहीं, बहुरुपिये हर ओर।
महिमा अपरम्पार है, कोई ओर-न-छोर।।
छ: :
नारी का अपमान कर, बन जाता है वीर।
कहाँ सो रहा शौर्य है, सीना दे जो चीर।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १४ अप्रैल, २०१८ ई०)

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