प्रेम मे कब किसने मंजिलों को पाया है

डॉ० राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’—

कभी मत सोचना
किसी लड़के या आदमी को
चाहा है।
हमेशा याद रखना
ये अपना दूसरा जिस्म
पाया है।
जो होना था हुआ
जाने दो
नये दिनो की आहट को सुनो
और उन्हें आने दो।
प्यार हो या दोस्ती
जब तक निस्स्वार्थ है
तब तक है।
स्वार्थ आने के बाद माया है।
प्रेम मे हमेशा त्याग है
प्रेम खाक करती आग है।
प्रेम मे कब किसने
मंजिलों को पाया है।
जब जिन्दगी
दगा करे 'राघव'
तो फरियादेमौत बेहतर है।
प्रेम खोकर जो
जिन्दा रहते हैं
वह रोज हजार मौत
मरते हैं।
नाकाम प्रेमी से पूछो
मजा-ए-जिन्दगी 
वह नर्क की जिन्दगी
जी कर आया है।