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मौन हृदय की पीड़ाओं का जटिल व्याकरण बहुत सरल है

मौन हृदय की पीड़ाओं का जटिल व्याकरण बहुत सरल है;
भूखे मन को पढ़नेवाली केवल एक अकेली अम्मा ।

हाथ में मेंहँदी पाँव महावर,
डोली अरमानों की आई।
हर रिश्ते का धर्म निभाती,
चाची, बहू कभी भौजाई।।

विग्रह का संस्कार न जाने, है समास से गहरा नाता;
बच्चों सङ्ग बच्चा बन जाती,होती कभी सहेली अम्मा।

उम्मीदों के व्रत रखने से,
जीवन भर उपहास मिला है।
पोते – पोती वाले घर में,
घर के बाहर वास मिला है।

जीवन भर की पूजाओं का,प्रतिफ़ल देख रही है डेहरी;
दुर्गन्धों के महारास में, केवल एक चमेली अम्मा।

बूढ़ी आँखों को चश्में ने,
धुँधली दुनिया दिखा रखी है।
एक अकेले छड़ी बेचारी,
भू दो पग की बना रखी है।।

चेहरे की एक-एक झुर्री में,अनुभव का संसार छुपा है;
सम्बन्धों की परत- दर-परत बूझें सहज पहेली अम्मा।

रचनाकार – जगन्नाथ शुक्ल
(प्रयागराज)