कविता: मोल

किस्मत का नाम देना क्या सही है?
मर्जियां सब अपनी
और नाम किस्मत का
वक्त तो देखते ही नहीं
कि ज़माना कहां है
किताबें वो लेख कुछ अधूरे से हैं
जहां समानता की बात है।
खुद के फैंसले
खुद के सवाल
खुद ही गवाह
और खुद के ही जवाब
तबाही का समंदर भी ख़ुद ही
फिर क्यूं नेक होने का नाटक है।
पैग़ाम नीलामी नहीं
मगर किसी नीलामी से कम नहीं।

प्रीति शर्मा
लद्दा, घुमारवीं, बिलासपुर, हि० प्र०