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डॉ० सपना दलवी की कविता— माँ

माँ के आँचल में जो सुकून है

वो सुकून कहीं और कहाँ?

सुना था मैंने, उसने सुनी जब

मेरी पहली किलकारी

तो आँखें उसकी नम सी हुई थीं

पाकर मुझे अपनी गोद में

उसने तो सारी दुनिया भुला दी

माँ के आँचल में जो सुकून है

वो सुकून कहीं और कहाँ?

रात में लोरी सुनाकर

जिसने मुझे मीठी नींद सुलाया

वैसी नींद मुझे अब कहाँ?

जिसने कोमल हाथों से दी थपकियाँ

उन थपकियों का स्पर्श अब कहाँ?

माँ के आँचल में जो सुकून है

वो सुकून कहीं और कहाँ?

पहली बार जब क़दम उठे

मैं तो लड़खड़ा कर गिर गयी

तब उसकी अँगुलियों ने थाम लिया

बिना लड़खड़ाये चलना सिखाया

माँ के आँचल में जो सुकून है

वो सुकून कहीं और कहाँ?

खुद भूखी रहकर जिसने मुझे खिलाया

अपने हिस्से का निवाला भी

उसने मुझे खिलाया

आज तरस रही हूँ मैं

पाने फिर से उस स्वाद को

पर वैसा निवाला अब कहाँ?

माँ के आँचल में जो सुकून है

वो सुकून कहीं और कहाँ?

माँ की याद तो हर वक़्त सताती है

दो पल बात करती हूँ

फ़िर भी उसकी याद आती हैं

आज नहीं रही सिर्फ़ मैं बेटी

किसी के घर की बन गयी हूँ बहू

मायके से ससुराल तक का सफ़र करते,

थका-रुका मेरा जीवन

याद आती है हर पल माँ।

माँ तो माँ होती है

उसके जैसा कोई और कहाँ?

माँ के आँचल में जो सुकून है

वो सुकून कहीं और कहाँ?

                 डॉ. सपना दलवी     
     एस.एच.तोंदले ॐ निवास, यू० बी० हिल्स    
       चौथा मार्ग, मालमडी धारवाड़ 580007                          
                   (कर्नाटक)