मैं उस वतन का चराग़ हूँ, चलती जहाँ अब गोलियाँ

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

मैं उस वतन का चराग़ हूँ,
जहाँ आँधियाँ-आँधियाँ।
चीर-हरण होता हर प्रहर,
चलती जहाँ अब गोलियाँ।
विस्थापित शराफ़त हो रही,
नंगों की दिखतीं टोलियाँ।
कार्पोरेट का डंका बज रहा,
फैली हैं सबकी झोलियाँ।
बदज़बानी कहर बरपा रही,
तालू से चिपकीं बोलियाँ।
साँसों का आता-पता नहीं,
कफ़न-सी दिखतीं खोलियाँ।
अभागन-बेचारी गयीं कहाँ,
ये कहाँ से आयीं चोलियाँ?
बिनब्याही माँ जो बन गयीं,
उठतीं कहाँ हैं डोलियाँ ?
गुनाहों का देव मचल गया,
सूली पे लटकीं भोलियाँ।
व्यभिचारी आश्रम में भरे,
मस्तक पर सजतीं रोलियाँ।

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