सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

पत्रकार या हिजड़ा

     सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’
मैं पत्रकार या  हिजड़ा हूँ ।
विद्वान साथियों आप बताओ ।
झूठ कहा तो सच समझाओ ॥
घटना कोई सुन पाऊँ ।
बिन देरी मौके से जाऊँ ॥
देखिके कहें मीडिया आई ।
पीठ के पीछे गाली खाई ॥
नजर में सबके लफड़ा हूँ ।

रोज बजाता कलम से ताली ।
मौत लिखूं चाहें खुशियाली ॥
बख्शीश नहीं कोई ऐसे देता ।
फजीहत से होता समझौता ॥
बिना बुलाये जन-जन जाता।
पीड़ित खुश तो वह गरियाता ।|
देशी बबूल का झंखडा हूँ ।

मन में समाज सेवा बसती ।
दुनिया ढोंग देख हंसती ॥
बौखल दुनिया कहे बवाली ।
फैदा केवल काम दलाली ॥
पैसा बिना मेहरूआ रूठी ।
हिजड़ बांडिया पद दै बैठी ॥
फ़च्कारेसि जैसे कपडा हूँ ।

बजते दिखी जहां शहनाई ।
ताली बजाकर मांग सुनाई ।|
मिला  नहीं तो हुआ बवाला ।
ख़ुशी समय में गडबडझाला ॥
अब पत्रकारिता बदल गई ।
मनचलों के संग मचल गई ॥
‘परदेशी’ पत्रकार या दुखड़ा हूँ ।