पिया-गाँव से प्रकृति चली

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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एक–
मेघदूत की नायिका, चितवन चारों ओर।
उमड़-घुमड़ संदेश कह, गरज पड़े घनघोर।।
दो–
करवट बादल ले रहे, बिजली तड़के घोर।
कनखी बरखा मारती, वन-वन नाचे मोर।।
तीन–
दादुर तत्पर मे दिखें, अवसर करते बात।
ताल-तलैया जब भरें, टर्र-टर्र दिन हो रात।।
चार–
मेघ-मेखला मंजुमय, मंजुलमय मन-गात।
मनमोदन मुद मोक्षदा, मंगलमय हो भात।।
पाँच–
ले उपहार प्रकृति चली, घूम-घूम हर ओर।
कहीं घटा को चूमती, कहीं करे मन थोर।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० जून, २०२३ ईसवी।)