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न्याय-देवता कह रहे, लाओ! घर में सौत

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति।
मन्दिर में मूरत दिखे, उड़न-छू हुई शक्ति।।
दो–
पट्टी बाँधे आँख में, देश जगाता चोर।
भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब शोर।।
तीन–
अजब-ग़ज़ब के लोग हैं, शर्म-हया से दूर।
सेंध लगी है देश में, लोग बने हैं सूर।।
चार–
लोकतन्त्र गूँगा बना, ‘अच्छे दिन’ की मौत।
न्याय-देवता कह रहे, लाओ! घर में सौत।।
पाँच–
दुनिया है उम्मीद पे, कहते ‘पृथ्वीनाथ’।
चीर अँधेरे को बढ़ो, दीप बढ़ाओ हाथ।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ अक्तूबर, २०२० ईसवी।)

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