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तनहाई की अँगड़ाई दे दो तो कोई बात बने

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरे होठों का रंग चुरा लो तो कोई बात बने,
तनहाई की अँगड़ाई दे दो तो कोई बात बने।
कानेमलाहत१ हो तो बदन को शराफ़त सिखलाओ,
ख़ुशअक्ख़लाक़२ पैरहन३ ले लो तो कोई बात बने।
बरखुर्र्दार! गिरे बाँ झाँकते ही पसीना बन जाते तुम,
ख़ुदग़र्ज़ी से तोबा कर लो तो फिर कोई बात बने।
ज़राफ़तपसन्दी४ हर सू वाजिब ठहरती नहीं प्यारे!
सागर से कुछ संजीदगी ले लो तो कोई बात बने।
ज़र्बान५ सदा देती है क्या कभी सुन पायी है तुमने ?
हक़ीक़त को अपनी आँखें बनाओ तो कोई बात बने।
तंगदिली६, तंगनज़री७, तंगचश्मी८ सब छोड़ आओ तुम,
तज्वीज़९ की ख़ूबसूरती ले लो तो कोई बात बने।

क्लिष्ट शब्दार्थ :—
१- अति लावण्यमती सुन्दरी २- शालीन ३- वस्त्र ४- हँसी-ठिठोली ५- हृदय की धड़कन; स्वर ६- ओछापन ७- संकीर्ण दृष्टि ८- नीचता ९- परामर्श

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)