एक अभिव्यक्ति : उसकी चुप्पी क्यों तह होकर रह जाती है चादर में?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


उसकी हक़ीक़त सिमट कर क्यों रह जाती है, चादर में,
अँगड़ाई लेकर वह क्यों सिमट जाता है, चादर में।
ऐ हवा! तू उस तक जाकर मेरा यह सवाल करना,
उसकी चुप्पी क्यों तह होकर रह जाती है, चादर में?
बात को बतकही बनाना जाकर कोई उससे सीखे,
एक-से-बढ़कर-एक नुस्खे छुपाये रखा है, चादर में।
मौक़ा भाँपकर वह गधे को अपना बाप बना लेता है,
बात बनते ही अपनी लाचारी छुपा लेता है, चादर में।
जिन मुद्दों पर वह जीत अपनी हासिल की थी,
असली मुद्दे क्यों अब वह सिमट रखा है, चादर में।
एक शख़्स की नीयत ईमान खोकर जीती है,
अस्ल चेहरा हर बार क्यों छुपा लेता है, वह चादर में।
कितना शातिर है, समूचे मुल्क को बीमार बना देता है,
तरह-तरह की ज़हरीली दवाएँ छुपाये रखा है, चादर में।
ऐ क़ुद्रत! अब मुल्क को उसके चंगुल से आज़ाद कर,
नायाब विस्फोट कर अब उसकी जादुई चादर में।

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