काव्यशिल्पी डॉ० दर्शन राही जी का शरीरान्त हुआ!

अवधेशप्रताप सिँह विश्वविद्यालय, रीवा (म० प्र०) के सेवानिवृत्त सहायक कुलसचिव, प्रखर विचारक-चिन्तक, समीचीन काव्यशिल्पी एवं श्रद्धेय अग्रज डॉ० दर्शन राही जी अब केवल स्मृति-शेष हैँ; परन्तु उनका कर्त्तृत्व जीवन्त है। उनकी पत्रसंस्कृति 'पोस्टकार्ड-लेखन' की लिपि स्मृतिकोशिका का विषय बन चुका है।

उनके आवासीय घर मे एक पारिवारिक सदस्य के रूप मे रहना; बौद्धिक-साहित्यिक चिन्तन करना; गूढ़ विचार-विनिमय करना एवं काव्यपाठ का श्रवण करना आदिक स्मृति-कोशिका का अनावरण करते-से प्रतीत हो रहे हैँ।
  
डॉ० राही जी की अनुभूति इतनी गहन और विस्तृत थी कि वे उसके पाश मे आबद्ध रहे, परिणामस्वरूप अपनी काव्यकृतियोँ का नामकरण करते समय उन्हेँ 'अनुभूति' शब्द से सम्पृक्त कर लेते थे।
 
जब मै अस्सी के दशक मे 'दैनिक जागरण' का साहित्य-प्रभारी एवं फ़ीचर-सम्पादक था तब वे प्राय: प्रति संध्या कुछ कविताओँ के साथ कार्यालय पहुँचकर भेँट करते थे। मुझे स्मरण है कि मेरे पास कवि-कवयित्रियोँ-द्वारा जितनी भी कविताएँ प्रेषित की जाती थीँ, उनमे से अकेले कविप्रिय डॉ० राही जी की होती थीँ, जो दूर से ही पहचान मे आ जाती थीँ। उनका तिर्यक् लेखन, काली स्याही का प्रयोग आदिक उनका रचना-वैशिष्ट्य होता था। उनकी कविता-कामिनी के प्रति अनुरक्ति का ही परिणाम और प्रभाव था कि उन्होँने अपने कनिष्ठ पुत्र का नामकरण 'कवि' किया था।
 
काव्यरचना का व्यसन इतना विकट था कि यावज्जीवन अपना वेतन और सेवानिवृत्ति-निधि (पेंशन) की से अपनी पुस्तकेँ प्रकाशित कराते रहे; कई वर्षोँ तक 'प्राणालोक' नामक अनियमित पत्रिका का प्रकाशन, उनके पुरुषार्थ को बहुविध रेखांकित करता रहा।
 
संस्कृत-विचक्षण बाणभट्ट के जन्मदिनांक पर प्रतिवर्ष  का उनका आयोजन अतीव समृद्ध रहा करता था, जिसमे बुद्धिजीविता और संस्कृतिजीविता का सम्मिश्रण रहा करता था।

स्मृति-शेष श्रद्धेय अग्रज डॉ० दर्शन राही जी (डॉ० दर्शन मिश्र जी) को अपनी भावाञ्जलि अर्पित करता हूँ।