मानसून-सत्र में विपक्षी दलों की नकारात्मक भूमिका

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

संसद् का मानसून-सत्र केवल हंगामा के कारण व्यर्थ होता जा रहा है। यही कारण है कि विपक्षी दलों का विरोध केवल ‘विरोध’ के लिए दिख रहा है। होना यह चाहिए कि विपक्षी दलों के विरोध के संदर्भ में सरकार का अधिकृत प्रवक्ता अथवा प्रधानमन्त्री अथवा गृहमन्त्री अपना पक्ष प्रस्तुत करे और विपक्षी दल के नेता शान्त होकर उसे सुने। पक्ष-समाप्ति के बाद असहमति और असंतुष्टि की स्थिति में विपक्षी दलों के नेताओं का दायित्व बन जाता है कि वे शालीनतापूर्वक प्रश्न करें और प्रतिप्रश्न भी। सम्बन्धित सरकारी प्रवक्ता का भी कर्त्तव्य बन जाता है कि वह शान्तिपूर्ण ढंग से उत्तर दे और प्रत्युत्तर भी।

लगातार बिना बहस के ही यह सत्र अराजकता की भेंट चढ़ता जा रहा है। विपक्षी सांसदों को विरोध करने का अधिकार है; परन्तु इसका अर्थ नहीं कि वे संसद् की गतिविधियों को अवरुद्ध कर दें। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज का सत्तापक्ष जब ‘कल’ का प्रतिपक्ष होता था तब उसी संसद् में भीषण ‘नंगा नाच’ करता था; किन्तु ऐसा कब तक चलता रहेगा? किसी-न-किसी विपक्षी दल को एक स्वस्थ-सुखद संसदीय परम्परा का निर्वहण तो करना ही होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ जुलाई, २०२१ ईसवी।)