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राजनैतिक व्यंग्य : दिल्ली में चेहरे की तलाश

महेन्द्र नाथ महर्षि, से•नि• वरिष्ठ अधिकारी दूरदर्शन (गुरुग्राम)-

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पिछली टीम के बहुत से चेहरे नयों से बदल दिए गए हैं। यह सामान्य बात है कि जिन के नाम नहीं हैं वे बेगानापन महसूस कर रहे हैं। क्या कारण है कि बदल दिए गए , इस पर अपने मन में झांक कर कारण खोजने की जगह ये लोग मुँडेर पर खड़े होकर इंतज़ार कर रहे होंगे कि कोई पुकार भर ले तो लपक कर पाला बदल लें। कुछ एक अबतक इधर-उधर एडजस्ट भी हो लिए हैं। यही बात आम आदमीं पार्टी पर भी चरितार्थ हो गई है। कुछ उधर से इधर आ जुड़े हैं। आख़िर भविष्य का सवाल तो है ही ना !

इस सारे घटनाक्रम में दो राष्ट्रीय पार्टी किस तलाश में जुटी हैं कि उनकी सूची नहीं आ रही है, यह यक्ष प्रश्न है लेकिन इसका उत्तर आम चर्चा में सर्व विदित है। दिल्ली चुनाव में चेहरे की तलाश ज़रा मुश्किल पहेली बन गई है। केजरीवाल को टक्कर देने वाले चेहरे पर एकमत हो पाना मुश्किल हो रहा है। इस पर पूर्वांचली चेहरे के मत बटोरू नाम पर बीजेपी दो पाटों के बीच है। एक तरफ़ स्थानीय दिल्ली वाले हैं तो दूसरी ओर प्रदेश में ही एक दो पाकेट्स में बाहर से आए पुरबिया बहुत वजन रखते हैं। इसी उहापोह में लिस्ट जारी होने में विलम्ब हो रहा है। कांग्रेसी ख़ेमे के पास नाम भले ही हो पर चेहरा दास कुछ भी नहीं है।

बीजेपी में एक विशेषता है कि उनका काडर बहुत संयत और ऊपरी दबाव में ही सही , काफ़ी अनुशासित है। पर दिक़्क़त तो उस चेहरे की तलाश है जो नाम उभरते ही सूरज की तरह दिग्-दिगंत को ऐसे रोशन कर दे कि ‘अरविंद’ की रोशनी फीकी पड़ जाए। कुछ ऐसा भी हो जाए कि ‘आप’ के खेमें में भी ऐसी सेंध लगे कि ‘पाइड पाईपर आफ हेमिल्टन ‘ की बाँसुरी के बजते ही संतुष्ट- असंतुष्ट या फिर भेड़ चाल नन्हे मासूम ‘आप’ कार्य -कर्ता पलक झपकने से पहले नए ताल में ताल ठोंकते हुए तैरने निकल आएँ।

गुप-चुप ही सही, खिचड़ी पक रही है। नाम उछल गया है-जो चेहरा बन गया तो ‘आप’ तो क्या उनके पूरे दल की हवा फिस्स हो सकती है। उस चेहरे का एक इंटरव्यू टी वी के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘लल्लन टाप’ में कुछ दिन पहले आया था, जिसमें एंकर ने कई बार घुमा फिराकर मन टटोलने की भरपूर कोशिश की और उसका उत्तर भी कभी मुस्कान में तो कभी प्रारब्ध में ‘विश्वास’ की अवधारणा के रूप में मिला भी। उधर यह बात भी खाड़ी के एक देश से संदेश के रूप में दिल्ली तक आ गई है कि, “मैं तो यहाँ एक कार्यक्रम में हूँ, वहाँ क्या चल रहा है; मुझे मालूम नहीं ?” बहुत शानदार उत्तर है, जिसके उत्तरदायी की विदेश से वापसी होते ही अगर बीजेपी चाणक्यों की बात तय हो गई तो दिल्ली में ‘आप’ “पाँच गज में ही पूरा थान” की तरह सिमट सकती है। नये रूप में अवतरित नई-दिल्ली का तख़्त न भी डोले तो भी विपक्ष में बैठी पार्टी की तरह सा दिख सकता है और तब फिर सत्ता पक्ष से कविता के कोमल फूलों की बौछार वाले अगले पाँच साल ,”क्या हो गया कि लोग बदल ही नहीं गए पलट भी गए” जैसे विश्लेषण में निकल जाएँगे। अक़्लमंदों को इशारा काफ़ी। नाम किसका ,चेहरा कौन , समझनेवाले समझ गए, न समझें वो अनाड़ी हैं।

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