सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

राजनीति करिये लेकिन देश के हितों को ऊपर रखकर नहीं

सिद्धान्त तिवारी-


छात्र राजनीति में वैचारिक मतभेद होना आम बात है, लेकिन इसी मतभेद के बीच अगर राष्ट्रविरोधी नारे लगने लग जाए तो किसी का भी खून खौल सकता है। क्या रामजस कॉलेज के शिक्षकों की अक्ल घास चरने गई थी, उन्होंने वक्ता के तौर पर एक ऐसे व्यक्ति का चयन किया जो अपने विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगा चूका था! कहा ये जा रहा था कि उसका चयन इसलिए हुआ क्योंकि जिस विषय पर उसे वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया वो उस विषय में पीएचडी कर रहे थे! संभवतः अभी उनकी पीएचडी पूरी नहीं हुई होगी और न ही उनकी थीसिस को बेहतरीन पाया गया होगा। बावजूद इसके उसको बुलाना निश्चित तौर पर आफत को निमंत्रण देना था। हद तो तब हो गई जब विरोध और वैचारिक मतभेद उग्रता में बदल गई!

इसी बीच कारगिल युद्ध में शहीद हुए एक सैनिक की बेटी ने एवीबीपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और इसी कड़ी में कहा कि उनके पिता को युद्ध ने मारा पाकिस्तान ने नहीं! वाह!आप उन लोगों का समर्थन कर रही हैं जो कश्मीर की आज़ादी की मांग कर रहे हैं , जो भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाते हैं! काश आपके पिताजी जिन्दा होते तो आप उनसे पूछ सकती की वो कश्मीर के लिए लड़े थे या भारत के लिए या फिर उस दरिंदे पाकिस्तान के लिए जो आये दिन अपनी आतंकी गतिविधियों से भारत की सुरक्षा में दखल देता रहा है।

जेएनयू में पिछले दिनों कश्मीर के साथ मणिपुर की आजादी के नारे लगे थे तो रामजस कालेज में कश्मीर के साथ बस्तर की भी आजादी के नारे लगे। मुझे समझ नहीं आता क्या उमर खालिद ने आदिवासियों पर शोध करते हुए यही पाया है कि बस्तर के लोग आजादी चाह रहे हैं? तर्क ये दिया जाता है कि आरोप साबित न होने तक हर शख्स बेगुनाह है और राष्ट्रद्रोह के आरोपी को भी अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन किसी को ये बात भी नहीं सोचनी चाहिए कि ऐसे शख्स का विरोध नहीं होगा। वामपंथियों का गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू के लोग मतलब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देश विरोधी नारे लगाए और आप जैसे लोग उसे सही ठहराए! राजनीति करिये लेकिन देश के हितों को ऊपर रखकर नहीं!!