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बढ़ती जनसंख्या और विनाश की ओर धकेला जाता पर्यावरण

पर्यावरण और जनसंख्या पर विशेष लेख

प्रकृति ने इंसानों को क्या दिया? एक वाक्य में इसका उत्तर दिया जाए तो “प्रकृति ने हमें जीवन दिया।” लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इंसानों ने प्रकृति को क्या दिया?

विकास और आधुनिकता की अंधी दौड़ में इंसानों ने भरपूर तरीके से प्रकृति को अनदेखा करते हुए विनाश की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। प्रदूषण, पेड़ों को काटना, बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाना, आसान भाषा में कहें तो मानव ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति और विस्तार के लिए प्राकृतिक संसाधनों को समेटकर अपने घरों की सजावट मात्र तक ही सीमित कर दिया।

देवभूमि भारत के इतिहास को देखा जाए तो पहले समय में मानव प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित हो अपना जीवन यापन करता था और पूर्णतया स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हुए दीर्घायु को प्राप्त करता था।

प्रकृति का ज्ञान और पर्यावरण का अर्थ

सृष्टि में जो तरह-तरह के जीव-जंतु, पेड़-पौधे एवं अन्य जितनी भी सजीव व निर्जीव वस्तुएं पाई जाती हैं यह सभी प्रकृति का ही अंग है। सभी वस्तुओं से मिलकर पर्यावरण का निर्माण हुआ है। आज के समाज में प्रकृति और पर्यावरण पर विस्तार से अध्ययन के साथ ही इनके व्यवहारिक ज्ञान पर लोग में जानकारी और जागरूकता होना बहुत आवश्यक है। विकास और आधुनिकता की तरफ तेजी से बढ़ रहे समाज को पर्यावरण से होने वाले फायदे एवं पर्यावरण को हो रहे विनाश से बचाने के लिए भरपूर ज्ञान को गंभीरता से समझाने के साथ ही इस पर कार्य करने की आवश्यकता है।

पर्यावरण शब्द संस्कृत के ‘परि’ और आवरण से मिलकर बना है। ‘परि’ (चारों ओर) आवरण (किसी वस्तु को ऊपर से या चारों ओर से ढकने वाली कोई वस्तु) अर्थात ऐसी चीजों का समूह जो किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से आवृत किए हुए है उसे पर्यावरण कहते हैं।

मानव जीवन में पर्यावरण का महत्त्व और लाभ

पर्यावरण हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह हरे-भरे पेड़-पौधे हमारे चारों तरफ के वातावरण को शुद्ध करके हमें स्वच्छ और सांस लेने लायक वायु देते हैं, तपती धूप में छांव देते हैं, भोजन के लिए भी मानव इन्हीं पर आश्रित होता है। पर्यावरण में जीवित, निर्जीव, प्राकृतिक तथा मानव द्वारा निर्मित वस्तुओं का समावेश है। पेड़-पौधे, नदी, हवा, प्रकाश, सूर्य, जल, पशु प्राकृतिक पर्यावरण की श्रेणी में ही आते हैं। पर्यावरण उन सभी भौतिक रासायनिक एवं जैविक कारकों की एक इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा परितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनका रूप और जीवन तय करते हैं।

पर्यावरण के प्रकार

मुख्य रूप से पर्यावरण को चार वर्गों में विभाजित किया जाता है स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल, और जैव मंडल।
पृथ्वी पर जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए इन सभी चीजों का संतुलन बहुत ही आवश्यक है। मेरे इस लेख और संदेश को आप सभी को आसान भाषा में समझाने के लिए पर्यावरण को दो तरीके से बताऊंगा।

पहला भौतिक पर्यावरण और दूसरा अभौतिक पर्यावरण।

भौतिक पर्यावरण

वो पर्यावरण जो हमारी प्रत्यक्ष आंखों से दिखता है। जिसे हम छूकर उसको आभास कर सकते हैं उसे भौतिक पर्यावरण कहते हैं। पेड़ पौधे, जल, वन, पर्वत ये सब भौतिक पर्यावरण का एक रूप है। इसकी सुंदरता बहुत ही मनमोहक होती है और ये पर्यावरण हमारे जीवन जीने में सहायक होता है। आजकल लोग के लिए अच्छे पर्यावरण से भरी जगह को पर्यटन स्थल का रूप दिया जा चुका है। पुराने समय के लोग में भौतिक पर्यावरण को सुरक्षित और संरक्षित करने की रुचि हुआ करती थी जिसके चलते ही हम आज तक पर्यावरण को देख सकते हैं और आज के समय का मानव विकास की लालसा में दिन पर दिन इसका विनाश करने में लगा हुआ है। प्रकृति का दोहन कर जंगलों को उजाड़ कर बड़े मैदान बना कर वहां शहर बसा दिए गए, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगा दी गईं। चट्टानों को मिटाकर रास्ते बना दिए गए, जिसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य था उसे हम अपने विकास मात्र की लालसा के लिए उजाड़ कर खत्म करते जा रहें हैं।

अभौतिक पर्यावरण

वह पर्यावरण जो हम प्रत्यक्ष आँखों से नही दिखाई देता जबकि यह भी हमारे चारों ओर फैला हुआ है। अभौतिक पर्यावरण वह है जो कि हमे प्रत्यक्ष दिखाई नही देता जिसका सिर्फ आभास कर सकते है। अभौतिक पर्यावरण हमें आजकल के रितिरिवाजों, धर्म, आस्था इत्यादि में देखने को मिलता है समय के साथ इसका भी पतन देखने को मिल रहा है। पुराने समय के लोगों द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों और आस्था और हमारी संस्कृति वक्त के साथ लोग भूलते जा रहे और शास्त्रों द्वारा बनाए गए सभी नियमों का उल्लंघन कर हमारी संस्कृति को भी क्षति पंहुचा रहे हैं। पुराने रिवाजों और अपनी संस्कृति पर शोध करना जरूरी है लेकिन इसका उल्लंघन कर इसको क्षति पंहुचाना कदापि उचित नहीं है।

बढ़ती जनसंख्या से प्रकृति का विनाश

वनों के हो रहे दोहन और विनाश की एक मुख्य वजह बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण भी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है वैसे-वैसे भोजन आवास और रोजगार की आवश्यकताएं भी बढ़ती जा रही हैं, जिसके परिणाम स्वरूप अनियमित रूप से शहरों और उद्योगों के विकास के लिए वनों को काट कर जगह बनाई जाने लगी।

पेड़ों का महत्त्व तो हम सबको बचपन से किताबों में भी पढ़ाया जा रहा कि पेड़-पौधे अपने भोजन को बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) में कार्बनडाइ ऑक्साइड को ग्रहण कर बदले में ऑक्सीजन गैस उत्पन्न करता है जो वायुमंडल को शुद्ध कर जीव-जातियों को सांस लेने लायक उपयुक्त बनाती है इतना ही नहीं वनों द्वारा पृथ्वी पर जलीय संतुलन भी बना रहता है।

वाहनों का बढ़ता प्रयोग

आज जिस प्रकार से पृथ्वी पर जनसंख्या वृद्धि हो रही है उससे मानव जीवन का आने वाला भविष्य भी बहुत भयावह हो जाएगा। क्योंकि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ मनुष्य आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है। फलस्वरूप रोजगार के लिए बड़े-बड़े उद्योगों का लगना जिससे वायुमंडल के साथ ही उसमे से निकले कचरे से जमीन और जल भी प्रदूषित हो रहा है। अपनी सुविधा मात्र के लिए वाहनों का भी उपयोग तेजी से बढ़ा दिया है जिससे निकले धुएं से हवा तेजी से प्रदूषित हो रही है और तेजी से तापमान में भी वृद्धि देखने को मिल रही है। वाहनों द्वारा छोड़ा गया जहरीला धुआं और ध्वनि विभिन्न प्रकार की व्याधियों को भी जन्म दे रहीं हैं।

वाहनों और उद्योगों से होने वाले प्रदूषण की अनदेखी दिन पर दिन भयावह रूप लेती जा रही है। आज भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व के छोटे से छोटे शहर वायु प्रदूषण की चपेट में आते जा रहे हैं।

उद्योग नगरियों के साथ अन्य बड़े शहरों में लोग आज कार्बन नामक एक बड़ी महामारी से ग्रसित होते हैं। सड़कों पर चलने वाले लोगों पर काले रंग की कार्बनयुक्त धूल जम जाती है और यही धूल सांस के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश कर हमें तरह-तरह की बीमारियां जैसे नेत्र रोग, स्वास रोग,चर्म रोग देती है।

आज आवश्यकता है कि बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाने को बहुत ही गंभीरता से लेते हुए सरकार के साथ मिलकर हम सबको एक बड़ी मुहिम चलाने की आवश्यकता है जिससे हमारी आने पीढ़ियां स्वास्थ्य पर्यावरण में जीवन व्यतीत कर सकें।

अवनीश मिश्रा
प्रदेश प्रभारी
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