सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

बेटी की इज्जत का पैमाना

विभांशु दिव्याल-

      विभांशु दिव्याल

बेचारे राजनेता! औरत के बारे में बोलते समय जब भी अपनी जुबान को थोड़ा-सा भी इधर-उधर हो जाने देते हैं तो इन पर बेभाव की पड़ने लगती है। मीडिया चटखारे ले-लेकर उकसावा पैदा करता है और देशभर के औरत हिमायती समूह उकस-उकस कर राशन-पानी लेकर इन पर चढ़ दौड़ते हैं। पिछले दिनों जो दो बयानवीर नेता नारीवादियों की लताड़ के शिकार हुए। वे थे भाजपा के बड़बोले विनय कटियार और जेडीयू के स्वयंभू शरद यादव जो अपनी लीक-तोड़ या लीक-छोड़ टिप्पणियों के लिए खासे मशहूर हैं।
पहले बात विनय कटियार की। बेचारे विनय कटियार पत्रकारिता की पोप-वेश्या ग्रंथि के शिकार हुए। जो इस ग्रंथि के बारे में जानते हैं वे तो जानते ही हैं, लेकिन जो नहीं जानते उन्हें संक्षेप में बता दिया जाए। एक पोप महोदय एक शहर की यात्रा पर थे। वहां के एक जुझारू, जिंदादिल, चतुर और पेशेवर पत्रकार ने एक सवाल दागा-आप इस शहर की वेश्याओं के बारे में क्या सोचते हैं? पोप ने हैरत से पूछा-क्या इस शहर में वेश्याएं हैं। अगले दिन अखबार में छपा कि पोप ने शहर की वेश्याओं के बारे में पूछा। खबर से ध्वनित हो रहा था जैसे पोप ने वेश्याओं में रुचि दिखाई हो। हमारे देश की पत्रकारिता भी यह काम बखूबी करती है। जब वह संदर्भ से हटकर बातों और बयानों को खबर बनाती है तो बड़ों-बड़ों को मुसीबत में डाल देती है। विनय कटियार पर एक चतुर-चितेरे पत्रकार ने सवाल दागा कि प्रियंका गांधी वाडरा कांग्रेस की स्टार प्रचारक बनकर उतरी हैं, तो आप पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? जाहिर है कि इसके जवाब में विनय कटियार यह नहीं कह सकते थे कि प्रियंका के आने से भाजपा ध्वस्त हो जाएगी। उन्हें प्रियंका के जिस गुण का प्रतिवाद सबसे ज्यादा करना ठीक लगा, वह उनका सौंदर्य था। अब इससे तो कोई इनकार कर नहीं सकता कि प्रियंका सुंदर हैं। प्रियंका के पास दो आस्तियां हैं-उनका सौंदर्य और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि। इनके अलावा, उनका राजनीतिक योगदान मात्र इतना रहा है कि वह अपनी मां और भाई के चुनाव क्षेत्रों में प्रचार करती रही हैं। इसके अतिरिक्त उनका कोई विशिष्ट राजनीतिक या सामाजिक योगदान हो, ऐसी कोई जानकारी कम-अज-कम इस स्तंभकार के पास नहीं है। तो विनय कटियार ने प्रियंका के सौंदर्य को ही राजनीतिक तौर पर कमतर करना ठीक समझा और कह दिया कि प्रियंका से ज्यादा खूबसूरत महिला प्रचारक उनके पास हैं। एक राजनेता से, जिसे दूसरी पार्टी के स्टार प्रचारक के विरोध में बोलना हो, इससे ज्यादा की उम्मीद क्या की जा सकती है। लेकिन हमारे नारीवादियों ने इस पर हाय-तौबा कर डाली। अब इन बेचारों को कौन समझाए कि नारी सौंदर्य आदिकाल से राजनीति का एक बड़ा हथियार रहा है, और इतिहास साक्षी है कि इसने न जाने कितनी राजनीतिक सत्ताओं को हिलाया-डुलाया है। इसका महत्त्व आज भी कम नहीं हुआ है। अगर इसका महत्त्व सचमुच कम हो गया होता तो हर राजनीतिक दल सुंदर अभिनेत्रियों को अपने पाले में खींचने के लिए लार नहीं टपका रहा होता। लेकिन इस देश की राजनीति को क्या कहा जाए जो स्वयं भी पोप-वेश्या ग्रंथि की मारी हुई है।
दूसरी टिप्पणी स्वयंभू टिप्पणीकार शरद यादव की थी। शरद यादव की टिप्पणी इतनी हल्की नहीं थी कि उसे विनय कटियार की टिप्पणी की तरह फूंक से उड़ा दिया जाए। शरद यादव ने पटना में दिए गए अपने एक भाषण में कहा था कि बेटी की इज्जत की तुलना में वोट की इज्जत ज्यादा बड़ी है। जब बेटी की इज्जत जाती है तो इससे उसका परिवार, उसका गांव और उसका समुदाय आहत होता है, लेकिन जब वोट की इज्जत जाती है यानी जब वोट की खरीद-फरोख्त होती है तो इससे समूचा देश आहत होता है। बेटी की इज्जत को वोट की इज्जत से कमतर आंकने पर शरद यादव की चहुंतरफा निंदा हुई और महिला आयोग ने उनके बयान को घोर नारी-विरोधी मानकर उन्हें नोटिस भी जारी कर दिया। आखिर, शरद यादव, नारीवादियों और महिला आयोग का ‘‘बेटी की इज्जत’ मापने का पैमाना क्या था? क्या इन तीनों के पैमाने में कोई भिन्नता थी? इज्जत के नाम पर बेटी का ऐसा क्या चला जाता है, जिससे उसका परिवार या उसका गांव या उसका समुदाय प्रभावित हो? अगर कोई बेटी की हत्या कर दे तो क्या कभी परिवार, गांव या समुदाय की इज्जत जाती है? उत्तर है-नहीं। अगर बेटी आक्रोश में आकर भारतीय दंड संहिता के अनुसार किसी की हत्या करने का सबसे बड़ा अपराध कर डाले तो क्या परिवार, गांव या समुदाय की इज्जत जाती है? उत्तर है-नहीं। ‘‘बेटी की इज्जत’ तब चली जाती है, जब वह स्वेच्छया या जबरन किसी यौनिक कृत्य की शिकार हो जाए। अगर कोई जबरन या बेटी की रजामंदी से यौन संबंध स्थापित कर ले तो ‘‘बेटी की इज्जत’ चली जाती है। बेटी की इज्जत का यह वह रूढ़ पैमाना है, जो बेटी के 21वीं सदी में प्रविष्ट कर जाने के बाद और कला, उद्योग या सेवा क्षेत्रों में उसकी धमकदार पहुंच के बावजूद उसके साथ चिपका हुआ है। प्रौद्योगिकी ने यौन संबंधों के परिणामों को नियंत्रित करने के बहुत से औजार बेटी के हाथ में थमा दिए हैं, लेकिन इसके बावजूद उसकी इज्जत का पैमाना जस का तस बना हुआ है।
शरद यादव जैसे प्रगतिशील व्यक्ति को वोटों की इज्जत के लिए बेटी की इज्जत के इस पैमाने को लागू नहीं करना चाहिए था। यथार्थ यह है कि बेटी के स्वैच्छिक यौन संबंध से न उसकी इज्जत जानी चाहिए, न उसके परिवार की, न गांव की और न उसके समुदाय की। और अगर बेटी को कोई जबरिया यौन संबंध का शिकार बनाता है, तो इज्जत बेटी की नहीं, उस व्यक्ति की जानी चाहिए जिसने बेटी को शिकार बनाया। उस परिवार की जानी चाहिए जिसमें बेटी को शिकार बनाने वाला व्यक्ति पैदा हुआ। उस गांव की जानी चाहिए जिसमें बेटी का यौन उत्पीड़न करने वाला व्यक्ति रहता है। उस समुदाय की जानी चाहिए जो समुदाय इज्जत का ठीकरा बेटी की दैहिक निजता का अपहरण करने वाले व्यक्ति के बजाय स्वयं बेटी पर फोड़ देता है।
इसमें कोई शक नहीं कि अपना वोट बेचना देश की इज्जत को बेचना है, लेकिन शरद यादव ने इज्जत की तुलना में बेटी को खड़ा करके औरत की इज्जत के उस रूढ़ पैमाने को वैधता दी जिसे अब तक पूरी तरह अवैध हो जाना चाहिए था। नारीवादियों और महिला आयोग के पास भी कोई दूसरा पैमाना नहीं था। उन्हें सोचना यह चाहिए कि आखिर, बेटी की इज्जत कब तक उसकी नारी योनि से चिपकी रहेगी।