कभी बालसाहित्य और बालपत्रकारिता का केन्द्रबिन्दु प्रयागराज होता था

  • बालदिवस (१४ नवम्बर) पर विशेष

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (बालसाहित्य-विशेषज्ञ)

एक समय था, जब (इलाहाबाद) प्रयागराज से देशभर में सर्वाधिक समाचारपत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। अफ़सोस! आज सब कुछ समाप्त हो चुका है। इसका मुख्य कारण यह है कि पहले बालसाहित्य का क्रय लाखों की संख्या में की जाती थी; परन्तु प्रकाशकों के कारनामों के कारण अब वैसी योजनाएँ भी समाप्त कर दी गयी हैं। हम यदि इलाहाबाद के बालसाहित्य पर विचार करते हैं तब ज्ञात होता है कि यहाँ कि बालपत्रकारिता भी समृद्ध रही है; परन्तु वर्षों से बालसाहित्य का ह्रास हो रहा है। ऐसा इसलिए कि आज का प्रकाशक बालसाहित्य की पुस्तकों के प्रकाशन के प्रति रुचि नहीं दिखाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि बालसाहित्य की पुस्तक-क्रय करानेवाली सभी शासकीय योजनाएँ ठहर गयी हैं।

पहले हम इलाहाबाद की बालपत्रकारिता पर विचार करते हैं। यहाँ से पहली बाल-पत्रिका ‘विद्यार्थी’ १९१४ ई० में प्रकाशित हुई थी। १९१५ ई० में गोपाल देवी के सम्पादन में ‘शिशु’ पत्रिका प्रकाशित हुई थी। १९१७ ई० में इण्डियन प्रेस से ‘बालसखा’ का प्रकाशन हुआ था। १९२७ ई० में ‘खिलौना’ पत्रिका प्रकाशित हुई थी। उसके बाद ‘चमचम’, हिन्दी मन्दिर से ‘वानर’ १९२७ ई० में प्रकाशित हुई थीं। आगे चलकर, ‘अक्षय भैया’ (१९३४ ई०), ‘तितली’ (१९४५ ई०), ‘बालबोध’, ‘शेर बच्चा’, ‘लल्ला’ (१९४८), ‘मनमोहन’ (१९४९ ई०), ‘विज्ञान जगत’ (साइंस डाइजेस्ट), ‘जंगल’ (१९६५ ई०) आदिक पत्रिकाएँ प्रकाशित होती रहीं। इसी क्रम में मेरे (लेखक) सम्पादन में अनेक बालसमाचारपत्र प्रकाशित किये गये थे, जिनमें ‘नन्हे-मुन्नो का समाचारपत्र’ (प्रबन्ध सम्पादक), ‘बालमित्र’ (सम्पादक-प्रकाशक) शामिल हैं। वर्तमान में, प्रयागराज से एक भी बालसमाचारपत्र/पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है।

आइए! अब इलाहाबाद और प्रयागराज के बालसाहित्य और साहित्यकार पर विचार करें। एक समय था, जब यहाँ से बालसाहित्य का देशभर में सर्वाधिक प्रकाशन होता था। ठाकुर श्रीनाथ सिंह, देवेन्द्र दत्त तिवारी, अंजनी कुमार दृगेश, उदयनारायण सिंह, प्रेमनारायण गौड़, शकुन्तला सिरोठिया, डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आदिक की बालसाहित्य-संवर्द्धन में महती भूमिका रही है। खेद है कि उसी प्रयागराज में बालसाहित्य के प्रकाशन में उपेक्षा बरती जा रही है। इसका मुख्य कारण है, शासकीय क्रय-योजनाएँ समाप्त कर दी गयी हैं। शासन को बालसाहित्य का क्रय करने के लिए एक पारदर्शी योजना बनानी होगी, जिसके आकर्षण में बँधकर देशभर के प्रकाशक बालसाहित्य का प्रकाशन पुन: करने लगें।