सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

शुद्ध शब्द-प्रयोग का ज्ञान प्राथमिक पाठशाला से ही कराना होगा

‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे १५ सितम्बर को ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज मे ‘शुद्धता के साथ भाषा का उत्थान कैसे हो?’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।

आरम्भ मे, मुख्य अतिथि डॉ० कल्पना वर्मा ने दीप-प्रज्वलन (‘प्रज्जवलन’, ‘प्रज्ज्वलन’ अशुद्ध हैं।) कर उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ अशुद्ध है।) परिचर्चामाला का उद्घाटन किया और मा सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया, तदनन्तर सरस्वती-वन्दना की प्रस्तुति की गयी।

अतिथिवृन्द का स्वागत साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने किया।

आयोजन मे अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार और भाषा-अनुरागी रमाशंकर श्रीवास्तव ने कहा, “आज सभी वक्ताओं ने जिस रूप मे अशुद्ध शब्दों के प्रयोग करने के प्रति चिन्ता व्यक्त की है, वह समय-सत्य है। रही बात प्रशासनिक स्तर पर शब्द-संशोधन करने की तो उससे जुड़े हुए लोग ही भाषास्तर पर स्खलित हैं। भाषाशास्त्र मे ध्वनिशास्त्र का होना ज़रूरी है।”

आर्यकन्या डिग्री कॉलेज मे हिन्दी-विभागाध्यक्ष डॉ० कल्पना वर्मा ने मुख्य अतिथि के रूप मे कहा, “हमे अपनी शुद्धता के पैमाने तय करने होंगे। इस समस्या को पकड़ना होगा। ‘मुक्त मीडिया’ (सोशल मीडिया) मे जिस तरह से अशुद्ध शब्द-प्रयोग किये जा रहे हैं, उन पर हमे काम करना होगा।”

इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय मे हिन्दी-विभाग के प्राध्यापक डॉ० राजेश गर्ग ने विशिष्ट अतिथि के रूप मे कहा, “हमने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सुझाव दिया था, “उच्चारणस्तर पर भी भाषा मे कुछ काम होना चाहिए। हम भाव-बोध और अर्थस्तर पर अशुद्धता को स्वीकार नहीं कर सकते।”

इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय मे हिन्दी-विभाग के प्राध्यापक डॉ० शिवप्रसाद शुक्ल ने विशिष्ट अतिथि के रूप मे बताया, “भाषा सभ्यता और संस्कृति का द्योतक है। हमे इसकी शुचिता की रक्षा करनी होगी।”

आयोजक भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विस्तारपूर्वक प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चस्तर तथा तकनीकी स्तर पर शुद्ध हिन्दी-भाषा को कैसे एक षड्यन्त्र के अन्तर्गत अशुद्ध कराया जा रहा है और उसकी स्थिति को कैसे परिष्कृत किया जाये, बताया-समझाया।

आर्यकन्या डिग्री कॉलेज की सहायक प्राध्यापक डॉ० अनुपमा सिंह ने बताया, “अभिव्यक्ति-स्तर पर हम अशुद्ध रहते हैं। विद्यार्थियों को प्राथमिक शाला से ही शुद्ध बोलना-लिखना सिखाया जाना चाहिए और अक्षरज्ञान कराना चाहिए।”

पत्रकार उर्वशी उपाध्याय ने कहा, “दैनिक समाचारपत्रों मे एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ होना चाहिए, जिसके माध्यम से शुद्ध भाषा का बोध कराया जाये।”

डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कहा, “हमे माध्यमिक स्तर पर अध्यापकों के साथ मिलकर भाषा-संशोधन करना होगा, तब कहीं जाकर हमे अपने लक्ष्य की प्राप्ति होगी।”

डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने कहा, “हमारे अँगरेज़ी-माध्यम के विद्यालयों मे स्थिति यह है कि जो सबसे निकम्मा है, उसे हिन्दी पढ़ाने का दायित्व सौंप दो।”

रेडियो-पत्रकार तौक़ीर ख़ान ने कहा, “हमे जो बचपन मे पढ़ाया गया था, वह ग़लत था। अब हमे फिर से विद्यार्थी बनना पड़ेगा।”

अग्रसेन इण्टरमीडिएट कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ० आद्याप्रसाद शुक्ल ने कहा, “समाज जिस शब्द को जिस रूप मे व्यवहार कर रहा है, हमे उसे उसी रूप मे स्वीकार करना होगा।”

प्रूफ़-रीडर और विद्यार्थी विनय तिवारी ने कहा, “हमे नये सिरे से भाषा का बोध करना होगा।”

इसी अवसर पर साहित्यकार सुरेशचन्द्र श्रीवास्तव का पुण्य स्मरण किया गया।

शिक्षक और लेखक रणविजय निषाद ने अभ्यागतवृन्द के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन किया।

इस अवसर पर ज्योति चित्रांशी, डॉ० अभिषेककुमार केसरवानी, कृष्णकुमार केसरवानी आदि श्रोता उपस्थित थे।

★ प्रस्तोता– रणविजय निषाद
(शिक्षक और लेखक)