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भाषाकार फादर कामिल बुल्के की स्मृति में ‘सर्जनपीठ’ का राष्ट्रीय आयोजन

● फ़ादर कामिल बुल्के, जिनका सम्पूर्ण जीवन ‘हिन्दीमय’ बना रहा!

‘मुक्तिदाता’, ‘नया विधान’, नील पक्षी’, ‘अँगरेज़ी-हिन्दीकोश’ आदिक कृतियों के प्रणेता फ़ादर कामिल बुल्के की आज (१७ अगस्त) निधनतिथि है और उनकी पुण्यस्मृति में ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।

परिसंवाद में भागीदारी करते हुए प्रो० शिवप्रसाद शुक्ल (आचार्य– हिन्दी-विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने बताया, “फ़ादर कामिल बुल्के का भारत आना सार्थक रहा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उनके द्वारा रामकथा पर किये गये शोधकार्य को आज के शोधार्थियों को देखना होगा और अपने शोध- कार्य से तुलना करना होगा। उनका अँगरेज़ी-हिन्दीकोश जग- ज़ाहिर है। डॉ० लुईजि पियो तेस्सीटोरी ने सर्वप्रथम फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से वाल्मीकि रामायण एवं श्री रामचरितमानस का तुलनात्मक अध्ययन किया था, जिसकी परम्परा को बुल्के ने आगे बढ़ाया।”

पुणे की हिन्दी-अध्येत्री डॉ० नीलम जैन ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रतिष्ठापना करनेवाले पद्मभूषण फ़ादर बुल्के ने रामकथा को तेजोमय कीर्ति- स्तम्भ बनाकर हिन्दी की अपूर्व सेवा की। बेल्जियम के शीशे की तरह उनका हिन्दी-अनुराग पारदर्शी है। उन्होंने निस्स्वार्थ भाव से रामचरित्र से प्रेरणा ग्रहण करते हुए, भारतीय संस्कृति-सिन्धु में अवगाहन कर, हिन्दी के दिव्य अमृतकुम्भ से अपनी लेखनी और वाणी को अभिसिंचित किया था। आजीवन हिन्दी के लिए समर्पित हिन्दी के संरक्षक, समर्थक तथा संवाहक के रूप में उनका कर्तृत्व अविस्मरणीय रहेगा।”

आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “कौन कहता है कि शब्द में शक्ति नहीं होती। जिसने भी सत्यनिष्ठ रहकर शब्द को धारण किया है, संसार को झुका दिया है। यह सर्वकालीन सत्य है। इसके लिए कथन और कर्म में अन्तर नहीं रहना चाहिए; और यही कर दिखाया सुदूर देश बेल्जियम के एक ज्ञान-पिपासु ने। फ़ादर कामिल बुल्के की कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा ने भारत में आते ही निखार पाया। वे यहाँ आकर हिन्दी की महत्ता से इतने प्रभावित हुए कि भारत की भालबिन्दी हिन्दी कामिल साहिब का कण्ठहार बन गयी। उन दिनों अँगरेज़ीराज था और तब शोधकर्म अँगरेज़ी में ही किये जाते थे। फादर कामिल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘देवनागरी लिपि’ एवं ‘हिन्दीभाषा’ में शोधकर्म के लिए आग्रह किया था। उन्होंने हठधर्मिता प्रदर्शित करते हुए ‘हिन्दी’ में ही शोध करने के लिए अपने शोध-निर्देशक डॉ० माताप्रसाद गुप्त से कहा था। उन्होंने ने भी स्वीकारोक्ति की; अन्तत:, उस भाषाकार के सकारात्मक हठ के सम्मुख इलाहाबाद-प्रशासन को झुकना पड़ा; परिणामत: देश के समस्त विश्वविद्यालयों में ‘हिन्दी-माध्यम’ में शोधकर्म-हेतु अनुमति मिल गयी थी। ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ ग्रन्थ सार्वजनिक हुआ था। उल्लेखनीय है कि फ़ादर बुल्के ने ‘राम’ पर शोध करते समय रामायण के तीन सौ रूपों की खोज की थी। इस प्रकार शोध के इतिहास में पहली बार ‘राम’ पर विधिवत् शोधकर्म करने का श्रेय बुल्के जी को जाता है।”

डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय (सहायक आचार्य– संस्कृत-विभाग, मुंगेर विश्वविद्यालय, बिहार) ने कहा, “फ़ादर कामिल बुल्के भारत आये तो थे ईसाईधर्म का प्रचार करने के लिए; परन्तु यहाँ की संस्कृति और सभ्यता से इतने प्रभावित हुए कि वे यहीं के होकर रह गये थे। फ़ादर कामिल ने गोस्वामी तुलसीदास जी एवं महर्षि वाल्मीकि-कृत रामकथाओं का गहन अध्ययन किया था। श्री रामचरितमानस और रामायणम् के अतिरिक्त अन्य रामायणों पर भी उन्होंने कार्य किये थे और उन्हें अपनी रामकथा में स्थान भी दिया था। बुल्के अपने जीते-जी ही हिन्दीभाषियों और हिन्दी के साहित्यकारों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गये थे। आज हम यह कह सकते हैं कि जब तक हिन्दी रहेगी तब तक फ़ादर का नाम भी लिया जाता रहेगा।”

डॉ० आशा राठौर (सहायक प्राध्यापक– हिन्दी-विभाग,
शासकीय महाविद्यालय, हट्टा दमोह, मध्यप्रदेश)
का मत है,” आज हम ऐसे महान् व्यक्ति की बात कर रहे हैं, जो था तो विदेशी; लेकिन भारतीय संस्कृति और भाषा में इतना रचा-बसा हुआ था कि उसका सम्पूर्ण जीवन हिन्दीमय दिखता था। उन्होंने अवधी और ब्रजबोलियाँ भी सीखीं। फ़ादर ने अपना जीवन हिन्दी-सेवा और संवर्द्धन के लिए अर्पित कर दिया। वर्ष १९७४ में उन्हें भारतसरकार ने पद्मभूषण से अलंकृत किया। उनका १७ सितम्बर, १९८२ ई० को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया था। विदेशी होकर भी हिन्दी की जो सेवा फादर कामिल बुल्के ने की है, वह सदैव स्मरणीय और वन्दनीय रहेगी।”