‘भाषाशिक्षण-केन्द्र’ की ओर से ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द’ का स्मरण

भारतेन्दु ने हिन्दी-गद्य की भाषा का स्वरूप निर्धारित किया था : डॉ० पृथ्वीनाथ

बौद्धिक, शैक्षिक, साहित्यिक संस्था ‘भाषाशिक्षण-केन्द्र’ की ओर से 9 सितम्बर को हिन्दी-साहित्य के इन्दु ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द’ के जन्मतिथि-समारोह का आयोजन बाई के बाग़, प्रयागराज में किया गया। “भारतेन्दु हरिश्चन्द ने हिन्दीगद्य की भाषा का स्वरूप निर्धारित किया था। उन्होंने गद्य के लिए उस खड़ी बोली को अपनाया, जिसका प्रचार शिक्षित जनता में शनै:-शनै: बढ़ रहा था। उन्होंने अपनी खड़ी बोली का महिमा-मण्डन न तो तत्सम शब्दों का आश्रय लेकर किया और न ही इस प्रयास में अरबी, फ़ारसी, पश्तो, तुर्की आदिक अभारतीय शब्दों से मुख मोड़ा। यही कारण है कि उनकी प्रयोगधर्मिता सफल रही।” भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने समारोह की अध्यक्षता करते हुए उक्त विचार व्यक्त किये थे। विशिष्ट अतिथि डॉ० रंजना उप्रैती का विचार था, ” भारतेन्दु जी आधुनिक हिन्दी-साहित्य-जागरण के अग्रदूत थे। राजा से रंक तक उनकी मित्रमण्डली में शामिल रहते थे।” रमन आदित्य ने कहा,” भारतेन्दु ने न केवल लिखा, बल्कि अन्य लेखकों को उत्साहित करके लिखवाया भी। उनकी साहित्यिक सेवा उल्लेखनीय रही है।”

डॉ० राजाराम सोनी ने कहा, “भारतेन्दु हिन्दी-साहित्य के अमर कलाकार हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी सेवाएँ बहुमूल्य हैं।”

डॉ० रहमान अख़्तर ने कहा, “भारतेन्दु सर्वतोन्मुखी प्रतिभासम्पन्न साहित्यकार थे। उन्होंने काव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक तथा निबन्ध विषयों पर उल्लेखनीय कार्य किये।

इस अवसर पर डॉ० त्रिवेणी शुक्ल, डॉ० सरोज विश्वकर्मा, हृदयनारायण, रुचिता यादव आदिक ने विचार व्यक्त किये। समारोह के आरम्भ में अध्यक्ष डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कनकलता के सहयोग से दीप प्रज्वलित कर समारोह का उद्घाटन किया था। डॉ० रेशमा ‘सलिला’ ने समारोह का संचालन किया था और डॉ० दीपक यादव ने संयोजन। हरेन्द्र पटेल ने आभार-ज्ञापन किया था।

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