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‘हिन्दीपत्रकारिता-दिवस’ की पूर्व-सन्ध्या मे (‘पूर्व-सन्ध्या पर’ अशुद्ध है।) सर्जनपीठ’ का आयोजन

“गिरावट पत्रकारिता के लिए अशुभ है”– रमाशंकर श्रीवास्तव

सारस्वत मंच सर्जनपीठ के तत्त्वावधान मे हिन्दीपत्रकारिता-दिवस की पूर्व-सन्ध्या मे इलाहाबाद की पत्रकारिता : कल-आज और कल विषय पर २९ मई को सारस्वत सभागार, लूकरगंज, प्रयागराज मे वरिष्ठ पत्रकार-विचारक रमाशंकर श्रीवास्तव की अध्यक्षता मे एक मुक्त परिचर्चा का आयोजन किया गया। आरम्भ मे अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने दीप-प्रज्वलन किया और सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण भी। आरम्भिक संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार और काव्यशिल्पी डॉ० चित्रांशी ने अतिथिवृन्द का स्वागत किया। उसके बाद डॉ० चित्रांशी ने परिचर्चा-संचालन का दायित्व आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय को सौंपा। उन्होंने अध्यक्ष, मुख्य अतिथि तथा विशिष्ट अतिथि का परिचय प्रस्तुत किया, तदनन्तर सभी वक्ता-वक्त्रियों का भी।

मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे साहित्यिक पत्रिका ‘सृजन के सरोकार’ के सम्पादक और वरिष्ठ सम्पादक गोपाल रंजन ने कहा, “इलाहाबाद की मिट्टी मे विद्रोह है, जिसकी आड़ मे हरकोर्ट बटलर यहाँ से राजधानी लखनऊ ले जाने में सफल रहा। विद्रोह के इसी स्वर का भरपूर परिचय इलाहाबाद की पत्रकारिता मे मिलता रहा है और हम उसका हिस्सा भी रहे हैं। इलाहाबाद की पत्रकारिता पर भी समय की काली छाया पड़ी है; पर कुछ अख़बारों को पढ़ने के बाद लगता है, राख मे थोड़ी आँच बाक़ी है। यह कहने मे संकोच नहीं होना चाहिए कि इलाहाबाद को लगातार छलने और दुर्बल बनाने की साज़िश की जा रही है। यदि ख़ामोशी इसी तरह बरक़रार रही तो जो भी बचा-खुचा है, उसे हम खो देंगे। दु:ख की बात यह है कि आवाज़ न जनता की ओर से उठ रही है न अख़बारों की ओर से।”

अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ सम्पादक-विचारक रमाशंकर श्रीवास्तव ने कहा, “स्वतन्त्रता- प्राप्ति के लिए की जानेवाली लेखनी का कार्य तत्कालीन सामाजिक कार्यकर्त्ताओं एवं विद्वानों-द्वारा प्राणपण से किया गया था; कालान्तर मे, स्वतन्त्रता- प्राप्ति के बाद जनमानस की विचारधारा एवं सोच मे अन्तर आया, जिसका प्रभाव आज की पत्रकारिता मे दिखायी पड़ता है। आज की पत्रकारिता मे व्यावसायिक लाभ, स्वार्थ तथा आपसी प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी है, जिसके चलते पत्रकारिता मिशन की जगह पूर्णतया व्यावसायिक हो गयी है। आज मीडिया (माध्यम) अपने चरमोत्कर्ष पर है, जबकि पत्रकारिता मे गिरावट आयी है; लेकिन यह गिरावट समाज के अन्य क्षेत्रों मे भी देखी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि भाषा मे आयी गिरावट पत्रकारिता के लिए अशुभ है, जो समय रहते सँभालनी होगी, अन्यथा इतिहास हमे कभी क्षमा नहीं करेगा।”

विशिष्ट अतिथि के रूप मे आकाशवाणी-दूरदर्शन के कार्यक्रम-प्रमुख डॉ० लोकेश शुक्ल ने कहा, “एक समय था, जब आकाशवाणी के प्रत्येक केन्द्र पर एक समाचार-संवाददाता नियुक्त किया जाता था, जिसकी समाचार-सम्पादन मे विशेष भूमिका होती थी। अब बदलते संदर्भ मे राष्ट्रीय समाचारों का प्रसारण दिल्ली और प्रादेशिक समाचारों का लखनऊ और गोरखपुर से किया जाता है। राष्ट्रीय समाचार प्रतिघण्टे और प्रादेशिक समाचार प्रात:-सायंकाल प्रतिदिन प्रसारित किये जाते हैं।”

आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने इलाहाबाद से प्रयागराज की पत्रकारीय भाषाप्रयोग के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, ”जबसे इलाहाबाद की हिन्दी-पत्रकारिता आरम्भ हुई थी तबसे लेकर अब तक भाषास्तर पर भाँति-भाँति के परिवर्त्तन होते आये हैं। हम यदि ऐसा कह दें कि भारतेन्दु और द्विवेदीयुगीन हिन्दी-पत्रकारिता शुद्ध शब्द प्रयोगस्तर पर शीर्षस्थ रही तो यह सत्यनिष्ठ कथन नहीं कहा जायेगा। उस समय भी अशुद्ध शब्द-प्रयोग किये जाते रहे, अन्यथा ‘आरोपी’, ‘जन्मदिन’, ‘प्रावधान’, ‘वैज्ञानिक’, ‘ओलम्पिक’, ‘अन्तर्राष्ट्रीय’, ‘भाषावैज्ञानिक’, ‘दार्शनिक’, ‘पूर्वाग्रह’, ‘सृजन’, ‘आलोचना’, ‘रंग-बिरंगा’, ‘मृत्योपरान्त’, ‘उपरान्त’ ‘एक दिनी’, ‘पुनर्प्रकाशित’, ‘पुनर्जीवित’, ‘ठेकेदार’ आदिक न जाने कितने शब्द हैं, जिनमे वर्तनीदोष है और प्रयोगदोष भी, आज अपने शुद्ध और उपयुक्त रूप मे दिखते। यदि इलाहाबाद के आदिकालीन और मध्यकालीन सम्पादकगण इन पर विचार किये होते तो हमारा समाज भी स्वस्थ शब्दप्रयोग को स्वीकार किये होता। मुझे प्रसन्नता है कि इलाहाबाद और प्रयागराज ही नहीं, देश के कई सम्पादकों के शुद्ध शब्दप्रयोग के प्रति सजगता का प्रमाण प्राप्त होता रहता है और मै सगर्व यथाशक्य उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास करता हूँ। इलाहाबाद के सभी सम्पादकवृन्द और सम्बन्धित संवाददातागण के पास मेरा सम्पर्कसूत्र है और सभी मे शुद्ध शब्दप्रयोग करने के प्रति सराहनीय चिन्ता है, जो कि शुद्ध शब्दप्रयोग के प्रति अपने पाठकवर्ग को आश्वस्त करती है।”

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने बताया,” स्वराज ‘ मे एक विज्ञापन छपता था :–
सम्पादक चाहिए– दो सूखे टिक्कड़ (रोटी), एक ग्लास ठण्ढा पानी और हर सम्पादकीय लिखने पर दस वर्षों के लिए कालापानी। इस अख़बार की चर्चा बस इसलिए ज़रूरी है कि पत्रकारिता भोग-विलासिता के पथ पर चलकर गुमराह न हो जाये।”

वरिष्ठ पत्रकार और कवयित्री उर्वशी उपाध्याय ने बताया, “वर्तमान समय मे, प्रयागराज मे साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप काफ़ी बदल गया है। जनसंचार का माध्यम अत्यधिक व्यापक हो चुका है, जिससे हर प्रकार का साहित्य अथवा जानकारी पलक झपकते ही हमे उपलब्ध हो जाती है । यह एक ओर सुखद है तो दूसरी ओर अत्यन्त चुनौतीपूर्ण भी है कि पत्र-पत्रिकाएँ लगातार कम हो रही हैं और वह पाठकवर्ग उपेक्षित हो रहा है।”

शिक्षक डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने बताया, ” इलाहाबाद की पत्र-पत्रिकाओ मे समाज के विविध विषय, महिलाओं से सम्बन्धित सामग्री बच्चों के लिए ज्ञानवर्द्धक सामग्री, भाषा और साहित्य के विविध रूपों के साथ- साथ स्वतन्त्रता की आवाज़ भी लगातार गूँजती रही । वर्तमान मे यहाँ से कई समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं; किन्तु जन-भावना को अपने पत्र मे जगह नहीं दे पा रहे हैं, जो कि शोचनीय स्थिति है।”

वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा ने बताया, “इलाहाबाद की समाचार-क्रान्ति ने पत्रकारिता को बहुआयामी बना दिया है। यह पहले की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी बन गयी है; लेकिन प्रयागराज की पत्रकारिता मे विषयवस्तु एवं प्रस्तुतीकरण विचारणीय है। कुछ पत्रकारों को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर की भाषा बेहद लचर है; गम्भीर विषयों की रिपोर्टिंग पढ़कर लगता नहीं कि हम प्रयागराज से प्रकाशित अखबार पढ़ रहे हैं।”

वरिष्ठ समाजसेविका और अधिवक्त्री नाज़िया नफ़ीस ने कहा,”इलाहाबाद की महिलाएँ ‘महिला-पत्रकारिता’ को लेकर सजग रहीं। उनकी सम्पादकीय दृष्टि समय के साथ चलती रही; चाहें पहली पत्रिका ‘भारत भगिनी’ (१८८८ ई०) की बात कर लें या फिर ‘सहेली’, ‘मनोरमा’ आदि की, सभी समय के साथ बदलती साज-सज्जा के साथ दिखती रहीं। यह दु:ख का विषय है कि अब महिलाओं के लिए प्रयागराज मे कोई पत्रिका नहीं है।”

वरिष्ठ रेडियो-पत्रकार तौक़ीर ख़ान ने इलाहाबाद की समृद्धि आकाशवाणी-पत्रकारिता को साझा करते हुए बताया,”पहले हमे आकाशवाणी-केन्द्र से बाहर निकल कर, रेडियो-पत्रकारिता करने के लिए आदेश किया जाता था। मै ‘ज्ञानवाणी’ से भी जुड़ा हुआ था, जहाँ हमे व्यावहारिक पत्रकारिता का अनौपचारिक प्रशिक्षण किया जाता था।”

वरिष्ठ पत्रकार ईश्वरशरण शुक्ल ने पत्रकारिता करने के विधि और सिद्धान्त पर विशद प्रकाश डाला था।
इस अवसर पर विनय तिवारी, मोहिनी कुमारी, आलोक चतुर्वेदी, चारुमित्रा आदि की भागीदारी रही। इनके अतिरिक्त उन लोग की बड़ी संख्या थी, जो अनामन्त्रित थे; परन्तु अन्त तक एक कुशल श्रोता की भूमिका मे बने रहे। आलोक चतुर्वेदी ने अपने-द्वारा प्रकाशित-सम्पादित पत्रिका ‘साहित्य संगम’ पत्रिका का वितरण किया था।

ज्योति चित्रांशी ने इस आयोजन के प्रबन्धन की प्रभावमयी भूमिका का निर्वहण किया।

कार्यक्रम का समापन ‘राष्ट्रगान’ से किया गया था।